नई दिल्ली. आत्महत्या की कोशिश अब अपराध की श्रेणी में नहीं आएगी। सरकार ने आईपीसी की धारा-309 हटाने का फैसला किया है। इसके लिए संसद में 36 साल बाद एक बार फिर विधेयक लाया जाएगा। 1978 में भी धारा को खत्म करने का विधेयक राज्यसभा में पारित हुआ था। लेकिन यह बिल लोकसभा पहुंचता, इससे पहले ही संसद भंग हो गई।
बुधवार को सरकार ने राज्यसभा में बताया कि आईपीसी में संशोधन किया जाएगा। गृह राज्यमंत्री हरिभाई चौधरी ने एक सवाल के जवाब में कहा, ‘विधि आयोग ने अपनी रिपोर्ट में धारा-309 हटाने की सिफारिश की थी। 18 राज्यों और चार केंद्र शासित प्रदेशों ने सहमति जताई है।’आईपीसी की धारा-309 कहती है- ‘जो आत्महत्या की कोशिश करे, उसे एक साल तक के साधारण कारावास या जुर्माना या दोनों सजा सुनाई जा सकती हैं।’ इस वजह से आत्महत्या का प्रयास करने वाले के खिलाफ अभी आपराधिक मामला दर्ज किया जाता है।
आयोग ने क्या कहा : विधि आयोग ने 2008 में सौंपी अपनी सिफारिशों में कहा था, ‘आत्महत्या का प्रयास मनोरोग से भरा कृत्य ज्यादा है। व्यक्ति पहले ही अपने जीवन से परेशान होता है। ऐसे में कानूनी कार्रवाई और सजा के प्रावधानों से उस व्यक्ति की पीड़ा को और बढ़ा देना अनुचित है।’
पक्ष में नहीं थी बिहार सरकार : केंद्र ने इस मुद्दे पर राज्यों से सलाह-मशविरा किया था। मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक बिहार सरकार ने गृह मंत्रालय से कहा, ‘यह धारा न हटाई जाए। क्योंकि इससे आत्मघाती बम हमलावर कानूनी शिकंजे से बच निकलेंगे।’ वहीं, मध्यप्रदेश और दिल्ली सरकार ने भी धारा-309 हटाने से पहले एहतियात बरतने का सुझाव दिया था।
अदालतों में भी उठता रहा है मामला
- 1987 में बॉम्बे हाई कोर्ट ने फैसला दिया कि आईपीसी की धारा-309 संविधान के अनुच्छेद-21 में उल्लेखित जीने के अधिकार का उल्लंघन करती है। इस धारा को खत्म किया जाना चाहिए।
- 1994 में सुप्रीम कोर्ट ने भी एक मामले में कहा कि जीने के अधिकार के मायने ये नहीं हैं कि कोई दबाव में जिंदगी जीने के लिए बाध्य है।
- 1996 में हालांकि सुप्रीम कोर्ट की संविधान बेंच ने कहा कि जीने के अधिकार का मतलब यह नहीं कि किसी व्यक्ति को जान देने का अधिकार मिल जाता है। लिहाजा धारा-309 जायज है।