इस बार गुजरात में हुई प्रधानमंत्री मोदी की रैलियों पर आपने गौर किया। नहीं ना। वजह हम बताते हैं। इन रैलियों में पीएम गुजराती में बोले थे, लिहाजा गुजरात के बाहर के लोगों ने सुना, समझा और ही टीवी वालों ने दिखाया। प्रधानमंत्री मोदी चीनी राष्ट्रपति से मुलाकात से एक दिन पहले ही गुजरात पहुंच गए थे। उनका जन्मदिन भी था। उसी दिन उपचुनावों के परिणाम भी आने थे। कोई शक नहीं कि उपचुनावों में भाजपा को बड़ा झटका लगा। सफाई में जो भी बहाने दिए जा सकते थे, सब पुराने किस्म के थे। एक नेताजी का कहना है कि उपचुनावों के नतीजे देखकर ही मोदी ने अपने भाषण गुजराती में दिए। लोकसभा चुनाव अभियान के दौरान
नरेंद्र मोदी जब गुजरात में भाषण देते थे, तो भी अधिकांशतः हिन्दी में बोलते थे, ताकि बाकी देश भी उन्हें सुन सके। लेकिन इस बार उन्होंने इससे उलट फैसला किया।
आंकड़ों का गीत-संगीत!
लंबा भाषण तो बुरी शै है ही, लंबी प्रेस कांफ्रेंस भी बुरी शै ही है। और रविवार के दिन सरकारी काम निर्धारित करना तो वैसे भी कर्मचारियों की बददुआ लेने के बराबर होता है। एक मंत्री सरकार के सौ दिनों की उपलब्धियां बताने बैठे, तो रविवार को। और उस पर भी लंबा वाला कार्यक्रम। प्रेस कांफ्रेंस कई राज्यों में एक साथ चली और वीडियो कांफ्रेंस के जरिए राज्यों के पत्रकारों के सवालों के भी जवाब दिए गए। लिहाजा प्रेस कांफ्रेंस ज्यादा ही लंबी खिंच गई। कुछ पत्रकार झुंझलाने लगे। कर्मचारी तो मन ही मन कुढ़ ही रहे थे। हालांकि मंत्रीजी का कहना था कि उन्होंने तो प्रेस कांफ्रेंस रविवार को इसलिए रखी थी, ताकि 'रिलैक्स' हो कर बातचीत की जा सके। आप बताइए। 'रिलैक्स' होने के लिए दुनिया में सरकारी आंकड़े ही बचे हैं।
क्लाईमेक्स पर ट्विस्ट
हालांकि नितिन गडकरी पार्टी अध्यक्ष रहते हुए आधी रात को मीटिंगें बुलाने का रिकार्ड कायम कर चुके हैं। उनकी भी प्रेस कांफ्रेंस हुई। तमाम राज्यों के मीडिया को निमंत्रण और सवाल जवाबों का बिल्कुल क्लाईमेक्स टाइप युद्ध, वो भी फिल्म की बिल्कुल शुरुआत से। सबकुछ ठीक चला। जब बारी गुजरात के पत्रकारों की आई, तो लगा कि सुपर क्लाईमेक्स तो अब होगा। लेकिन हुआ एंटी क्लाईमेक्स। गुजरात के पत्रकारों ने कह दिया कि उन्हें मंत्रीजी से कोई सवाल नहीं करना है। खैर, कहानी के इस ट्विस्ट के बाद फिल्म आगे बढ़ी।
दयालु मंत्री
ऐसा नहीं है कि सारे मंत्री इतने ही कठोर हैं। कुछ, करीब आधा दर्जन, प्रेस के प्रति दया भाव रखने वाले, माननीय मंत्रियों ने अभी तक अपनी 100 दिनों वाली प्रेस कांफ्रेंस नहीं की है। सुना है कि प्रधानमंत्री मोदी इससे अप्रसन्न हैं और उन्होंने इन मंत्रियों से लेखा-जोखा मांग लिया है। यह भी सुना है कि कृषि मंत्री राधामोहन सिंह ने प्रेस कांफ्रेंस करने से यह कहकर इनकार कर दिया था कि भई खेती मंत्री की टीआरपी गांवों में निवास करती है, प्रेस कांफ्रेंस में नहीं। हालांकि बाद में उन्हें भी प्रेस कांफ्रेंस करनी पड़ गई।
परमानेंट मौन
वैसे सच यह है कि अगर सारे नेता प्रेस पर रहम करने लगें, तो प्रेस भी भूखों मरने की हालत में जाएगी।
मनमोहन सिंह का मामला अलग है। वे खुद नहीं बोलते थे, लेकिन प्रेस के लिए भरपूर मसाला मुहैया हो जाता था। अब जब पूर्व सीएजी विनोद राय की किताब और उनके इंटरव्यू ने टूजी और कोयला घोटाले को लेकर मनमोहन सिंह पर कहकर, सीधे और करारे हमले किए, मौनमोहन सिंह तब भी मौन रहे। अब मनमोहन सिंह वित्त मंत्रालय की स्थायी समिति में हैं। समिति में चिटफंड, सेबी, प्रवर्तन निदेशालय आदि को लेकर चर्चा हुई। लेकिन मनमोहन सिंह ने यह कहकर कुछ भी कहने से इंकार कर दिया कि भई मैं दस साल पीएम रह चुका हूं। लिहाजा मैं कुछ नहीं बोलूंगा।
अच्छे दिन भी बाकी हैं
वैसे भी नरेंद्र मोदी ने प्रेस को सरकारी खर्च वाली विदेश यात्राओं के लिए तरसा दिया है। पीएम विदेश दौरों पर अपने साथ बहुत छोटा का मीडिया जत्था रखते हैं। हो सकता है, आगे कभी उनका मूड बदले। लेकिन राष्ट्रपति भवन कवर करने वाले पत्रकारों को कोई दिक्कत नहीं है। राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी हाल में वियतनाम गए, तो भारी-भरकम मीडिया मंडल उनके साथ था। अब वे नीदरलैंड्स जाने वाले हैं, और अब भी भारी मीडिया मंडली साथ जाएगी।
वक्त-वक्त की बात है
मीडिया इस मंडली के अलावा भी होता है। जैसे सोशल मीडिया। जैसे अनसोशल मीडिया, जो कई बार चुटकुला मीडिया के नाम से जाना जाता है। बहरहाल, इस मीडिया में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर उस बात को लेकर निशाना साधा गया है, जो आसानी से हजम नहीं होता।
जम्मू-कश्मीर में बाढ़ आई, तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बहुत तेजी से सक्रिय हुए। तुरंत पहुंचे, और जो हो सकता था, किया। उन्होंने हवाई सर्वे भी किया और यहीं से इस मीडिया को खबर मिल गई। खबर यह कि पिछले साल जब असम में बाढ़ आई थी और तब के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने हवाई सर्वे किया था, तो तब संघ के प्रवक्ता राम माधव ने उनकी खिल्ली उड़ाई थी। अब वही खिल्ली नरेंद्र मोदी के हवाई सर्वे से जोड़ दी गई है।
मैनहटन से नैनगठन
अब मोदी अमेरिका जा रहे हैं और अपने साथ, या सही शब्दों में कहें तो, सरकारी खर्च पर भारी-भरकम मीडिया वहां भी नहीं ले जा रहे हैं। लेकिन मोदी की अमेरिका यात्रा मीडिया के लिए बड़ा मेला है। 90 से 100 चैनल वहां पहुंच रहे हैं और कुछ चैनल मैनहटन से सीधा और लगातार नैनगठन करने जा रहे हैं। माने मोदी भले ही लिफ्ट दें, मीडिया मोदी के साथ बना रहेगा।
अंतिम क्षण पर कॉल-बैक
महाराष्ट्र में शिवसेना-भाजपा खींचतान को सुलझाने के लिए नितिन गडकरी मुंबई जाने वाले थे, लेकिन विमान में सवार होने के पहले ही उन्हें फोन करके मुंबई जाने से मना कर दिया गया। उनसे कहा गया कि प्रदेश के नेता इससे निपट रहे हैं, आप उन्हें ही निपटने दें। जाहिर है, मोदी प्रदेश के नेताओं का साथ दे रहे हैं।
मैं बाढ़ मंत्री, वो मेहमान मंत्री
पीएमओ में राज्यमंत्री जितेंद्र सिंह को जिम्मेदारी दी गई थी कि वे विदेशी मेहमानों के स्वागत में मौजूद रहें, लेकिन इस बार
जम्मू के रहने वाले जितेंद्र सिंह को जम्मू-
कश्मीर में बाढ़ राहत कार्यों की देखरेख के लिए भेज दिया गया, और चीनी राष्ट्रपति के स्वागत का दायित्व स्मृति ईरानी को सौंप दिया गया। वो भी बिल्कुल अंतिम मौके पर। उधर, जितेंद्र सिंह ने जम्मू में बढ़िया काम कर दिखाया।
मैं, मंत्री, मुझे जाने दो
चीनी राष्ट्रपति की भारत यात्रा के दौरान सुरक्षा को लेकर बरती गई सावधानियां इतनी ज्यादा थीं कि दिल्ली के ताज पैलेस होटल में पुलिस ने स्मृति ईरानी को भी रोक दिया था। स्मृति ईरानी को बताया पड़ा कि वो मंत्री हैं।
पित्रोदा पर निशाना!
सुना है कि अपने टैमब्रैम, यानी कि सुब्रह्मण्यम स्वामी ने पीएम को पत्र लिखा है कि सैम पित्रोदा की गतिविधियों पर नजर रखी जाए।