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घनघोर-घटाटोप अन्याय

9 वर्ष पहले
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सरकारस्य सारम्, वित्त मंत्रालयम्। और वित्त मंत्रालय का सार होता है, इस मंत्रालय की अफसरी। अफसरी का सार होता है, वित्त सचिव का पद। पद का सार है, लालबत्ती। लालबत्ती का सार है, रायसीना की सड़क। लेकिन ये सारे शाश्वत नियम इन दिनों फेल चल रहे हैं। प्रणबदा वित्तमंत्री थे, राष्ट्रपति होने वाले हैं और बीच की इस अवधि में आम आदमी और सांसद की डबल भूमिका में हैं। प्रणबदा के इस्तीफे के बाद से मनमोहन सिंह भी प्रधानमंत्री और वित्तमंत्री की डबल भूमिका में हैं। इस चक्कर में बेचारे वित्त मंत्रालय के अफसरों की नार्थ ब्लॉक से साउथ ब्लॉक बार-बार परेड हो रही है, वो भी बिना वाया वाशिंगटन-पेरिस, सिर्फ सड़क के आर-पार। यानी लालबत्ती की भी कोई तुक नहीं बचती। कोई फुलटाइम वित्तमंत्री न होने से बेचारी अफसरशाही को आम आदमी का डबल रोल निभाना पड़ रहा है। घनघोर अन्याय है। किस्मत का सर्किट आपको पुराने जमाने का दूरदर्शन याद है? कुछ लोग कहते हैं कि उस जमाने में दूरदर्शन 'रुकावट के लिए खेद है' वाली पट्टी के लिए जाना जाता था। अब देखिए, कांग्रेस भी पीवी नरसिंहराव को अपने इतिहास में 'रुकावट के लिए खेद है' वाली पट्टी से ज्यादा कुछ नहीं मानती। लेकिन चर्चा बाजार में यही पट्टी सबसे ज्यादा लोकप्रिय बनी हुई है। वजह यह है कि मनमोहन सिंह अब फिर अपनी पूरी ताकत वित्त मंत्रालय में लगाने के मूड में हैं। वैसे ही, जैसे उन्होंने १९९१ में नरसिंहराव सरकार में वित्त मंत्री बनने पर लगाई थी। इधर सी साल नरसिंहराव की ९१वीं जयंती भी पड़ रही है। यानी फिर '९१, वही राव और वही मनमोहन'। तो क्या '९१-राव-मनमोहन' टाइप का कोई कनेक्शन है? लोग कहते हैं कि है और मनमोहन के लिए लकी भी है। नकद इनाम 101 रुपए टैमब्रेमयानी सुब्रह्मण्यम स्वामी भारत की राजनीति के असली रॉबिनहुड हैं। जिसके पीछे पड़ जाएं, उसका जीना दुश्वार कर देते हैं। तब न कोई दोस्त होता है और न सगा। चिदंबरम के बाद भी और चिदंबरम के साथ भी, आजकल स्वामी प्रणब मुखर्जी के पीछे पड़े हुए हैं। प्रणबदा से उनके बरसों पुराने संबंध भी हैं। इस राजनीति का रिश्तों पर क्या असर पड़ेगा, इस सवाल के जवाब में सुब्रह्मण्यम स्वामी ने कहा- 'रजत गुप्ता मेरे पुराने छात्र हैं और अमेरिकी अदालत उनको दोषी करार दे चुकी है। लेकिन इससे मेरे संबंधों पर फर्क नहीं पड़ता।' आप ही बताइए, 'अदालत' और 'दोषी' जैसे शब्दों से स्वामी का इशारा किस तरफ था? सोचकर बताइए? ये भी तो हो सकता है कि चिदंबरम वित्तमंत्री बन जाएं और फिर वह सही जवाब देने वाले को इनाम की घोषणा बजट में कर दें। यही २०१३ में। बिहारी टैमब्रेम वैसे एसएस आहलुवालिया भी टैमबे्रम से कम जटी-बली नहीं हैं। उनके दुश्मन कांग्रेस में भी काफी हैं और भाजपा में भी। लेकिन बहुत से लोग उन्हें पसंद भी बहुत करते हैं और यह तो हर कोई मानता है कि आहलुवालिया जितने गुणी बिरले ही होते हैं। आजकल आहलुवालिया के दिन ठीक नहीं चल रहे हैं। राज्यसभा के बाद वे तख्त पटना साहिब गुरुद्वारा प्रबंधन का चुनाव भी हार गए। लेकिन हारते सिर्फ योद्धा हैं और शायद इसीलिए नितिन गडकरी ने उन्हें संगमा के चुनाव प्रबंधन की जिम्मेदारी दे दी है। पापा बड़े या पोस्ट? अब बात सुब्रह्मण्यम स्वामी और आहलुवालिया, दोनों के कैंडिडेट यानी पीए संगमा की। संगमा की बेटी अगाथा एनसीपी के कोटे से मनमोहन सरकार में मंत्री हैं। संगमा का इरादा पहले अगाथा के घर से ही चुनाव अभियान चलाने का था। शुरुआत भी वहीं से हुई, लेकिन पवार साब ने पावरफुल किस्म की चेतावनी दे दी। इसके बाद से संगमा ने चुनाव अभियान चलाने के लिए वि_लभाई पटेल हाउस में एक कमरा ले लिया है और प्रेस कांफ्रेंस अनंत कुमार के घर के लॉन में करते हैं। अगाथा पर इस पावरफुल चेतावनी का इतना असर हुआ है कि वह पापा के साथ कहीं नजर भी नहीं आती हैं। यहां तक कि नितिन गडकरी के बेटी की शादी के रिसेप्शन में जैसे ही उन्होंने कैमरे वाले देखे, वह फौरन पापा से दूर हो गईं। सवाल है- पापा बड़े या पोस्ट? जवाब है- पोस्ट। आखिर १९ जुलाई के चुनाव तक की तो बात है। प्रेसिडेंट-इन-वेटिंग कुछ लोगों का कहना है कि संगमा ने अपने चुनाव अभियान में ही एक अपशकुन कर डाला है। वह अपशकुन यह है कि उन्होंने अपने पक्ष में एक वेबसाइट शुरू की है। ऐसी ही वेबसाइट आडवाणी के पक्ष में २००९ के आम चुनावों से पहले भी शुरू की गई थी और बेकार साबित हुई थी। लोगों का कहना है कि भारत की राजनीति में ट्विटर-विटर, वेबसाइट और फेसबुक वगैरह ज्यादा नहीं फले हैं। आडवाणी वेबसाइट से 'पीएम-इन-वेटिंग' हो गए, मजाक है कि संगमा 'प्रेसिडेंट-इन-वेटिंग' हो जाएंगे। ...देखो, तेल की धार देखो 'यूपी', "आय से अधिक संपत्ति", "सीबीआई" और "सुप्रीम कोर्ट"; इन चार बातों का उल्लेख करते ही जो दो राजनीतिक नाम जेहन में आते हैं, उनमें से एक के लिए कांग्रेस के गलियारों में हाई-प्रोफाइल जुमला यह होता है कि "बस, अब फलां... साब का प्रमोशन होने ही वाला है।" वैसे मायावती पर लगे भ्रष्टाचार के आरोप के सिलसिले में फैसला देने वाले सुप्रीम कोर्ट के दोनों माननीय न्यायाधीश भविष्य में भारत के प्रधान न्यायाधीश बनने वाले हैं। छोटे 'अ' से अखिलेश सरकार "ए" फॉर अखिलेश यादव की। लेकिन असली राजपाट है "ए" फॉर अंबिका चौधरी, "ए" फॉर आजम खां और "ए" फॉर अनीता सिंह का। सरकार हांकने वाले चौथे सरदार हैं शिवपाल यादव। इस "ए" सीरीज पर अंकुश रखने के लिए आईएएस "ए" फॉर आलोक कुमार को लगाया गया है। इस चक्करघिन्नी में फंसे युवराज अभी तक अपने सुनाए आठ फैसले पलट चुके हैं। धूमल के दांव प्रेमकुमार धूमल का पक्का इरादा है कि वह ऐसी कोई गलती नहीं करेंगे, जैसी निशंक कर चुके हैं। लिहाजा महेश्वर सिंह और शांताकुमार को मंडी के थॉमस बैनन के जरिए साधा गया है। समझौता कराने वालों में बाबा रामदेव भी शामिल रहे हैं। हिंग्लिश-हिलस्टिश रायसीना हिल पर बने राष्ट्रपति भवन की अपनी कहानी है। इसे अंग्रेजों ने वायसराय के लिए बनवाया था। आज भी इसके एक-एक खंभे पर अंग्रेजियत का इतिहास खुदा हुआ है। आजादी के बाद इसके वाशिंदों में उत्तर-दक्षिण भारत के तो कई लोग रहे, लेकिन ठेठ उत्कल-बंग का कोई व्यक्ति पहली बार भारत-भाग्य-विधाता बनने जा रहा है। इसके बाद से हिल्सा (एक तरह की मछली, बांग्ला उच्चारण- हिलिश) के शौकीन बंगालियों का पसंदीदा हिलस्टिश (हिल स्टेशन) कौन सा होगा? जाहिर है- रायसीना हिल।

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