नई दिल्ली. सीबीआई के निशाने पर इस समय पवन बंसल और उनके रिश्तेदार हैं मगर पूर्व रेल मंत्रियों के समय हुए रेलवे बोर्ड की नियुक्तियों की जांच-पड़ताल की जाए तो कई और नेता निशाने पर आ सकते हैं।
मंत्रालय के सूत्रों के अनुसार लगभग हर रेल मंत्री के समय रेलवे बोर्ड की नियुक्तियों में खुलकर पक्षपात किए गए हैं और नियुक्ति के आवश्यक नियमों की अनदेखी की गई। रेलवे बोर्ड का सदस्य बनने के लिए आवश्यक है कि उम्मीदवार कम-से-कम एक साल का बतौर ओपन-लाइन जनरल मैनेजर हो, उसके रिटायर होने में दो साल बाकी हों और विजिलेंस क्लीयरेंस हो। मजे की बात यह है कि ऐसी सभी नियुक्तियां को लेकर काफी लिखा-पढ़ी हुई है और आपत्तियां भी उठाई गई हैं। मगर नेताओं की मनमानी के आगे किसी की नहीं चली।
सूत्रों के अनुसार 2003 में नीतीश कुमार के रेल मंत्री के कार्यकाल में कई अफसरों की अनदेखी करके आरके सिंह को रेलवे बोर्ड का चेयरमैन बनाया गया जबकि उनके पास आवश्यक ओपन-लाइन जनरल मैनेजर का अनुभव नहीं था। सूत्रों के मुताबिक उन्हें वरिष्ठता के नाम पर यह पद दिया गया। इसी तरह 2004 में लालू यादव के कार्यकाल में आरएस वार्ष्णेय भी कइयों की वरीयता लांघकर सदस्य बनाए गए। उसी दौरान नियमों की अनदेखी करके आरआर भंडारी को मेंबर मैकेनिकल बनाया गया। भंडारी की केवल नौ महीने की नौकरी बाकी थी जबकि दो साल का समय होना जरूरी है। भंडारी के बाद आरके राव उनकी जगह पर आए और उनका भी ओपन लाइन जनरल मैनेजर का कार्यकाल महज दो महीने का था। अधिकारियों के अनुसार ममता बनर्जी के रेल मंत्री रहते वीके कौल को बिना विजिलेंस क्लीयरेंस के डेडिकेटेड फ्रेट कॉरीडोर कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया का मैनेजिंग डायरेक्टर बनाया गया। बाद में उन्हें 2010 में भ्रष्टाचार के आरोप में हटाया गया। ममता के कार्यकाल में ही विवेक सहाय को 2010 में रेलवे बोर्ड का चेयरमैन बनाया गया जिस पर दीपक कृष्णा का हक अधिक बनता था। नियमों की अनदेखी का हाल तो ये है कि कई बार मनपसंद अफसर न मिलने पर लंबे समय तक पोस्ट खाली रखी जाती है। ममता के कार्यकाल में मेंबर ट्रैफिक का पद करीब तेरह महीने तक खाली रहा और करीब दस महीने तक चार जनरल मैनेजरों के स्थान भी रिक्त रहे। खुद बंसल ने मेंबर इंजीनियरिंग का पद दो महीने खाली रखा। मौजूदा मेंबर इलेक्ट्रिकल कुलभूषण भी नियुक्ति के मापदंड पूरे नहीं कर पाए थे क्योंकि उनका ओपन-लाइन जनरल मैनेजर का कार्यकाल निर्धारित अवधि से कम था। गौरतलब है कि इसी स्थान पर महेश कुमार आना चाहते थे जो अब सीबीआई की गिरफ्त में हैं।
रेलवे अधिकारियों का कहना है कि रेलवे बोर्ड मेंबर की नियुक्ति के नियम भी मंत्रियों के मर्जी के अनुसार बदलते रहे हैं। रेलवे के लिए कैबिनेट की नियुक्ति समिति के नियम 16 फरवरी 1987 में बने थे। फिर, 5 अप्रैल 2006, 4 जून 2007 और 7 अगस्त 2007 को इनमें मनपसंद नियुक्तियों के लिए बदलाव किए गए। गौरतलब है कि इस पूरी अवधि में लालू यादव रेल मंत्री थे। रेलवे अधिकारी संघ के सचिव शुभ्रांशु कहते हैं, ‘रेलवे बोर्ड चेयरमैन और मेंबर की नियुक्तियों के लिए नियम तय हैं लेकिन जब कोई मनपसंद उम्मीदवार की नियुक्ति के लिए नियमों में छिद्र को आधार बनाया जाता है।’