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भ्रष्टाचार का अड्डा बन गई हैं राशन की दुकानें: सुप्रीम कोर्ट

9 वर्ष पहले
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नई दिल्ली. लोगों को रियायती अनाज दिए जाने के मसले पर सुप्रीम कोर्ट के एक पैनल ने सरकार से कुछ सख्त तेवर अपनाने को कहा है। दरअसल, इस पैनल ने अपनी सिफारिश में कहा है कि गरीबी रेखा से ऊपर जीवन यापन कर रहे (एपीएल) परिवारों को सबिसडी वाला अनाज कतई नहीं दिया जाना चाहिए। पैनल की एक अन्य अनुशंसा यह है कि रियायती खाद्यान्न के वितरण का काम निजी ठेकेदारों द्वारा संचालित की जा रही उचित मूल्यों वाली दुकानों (एफपीएस) से छीन कर उसे सरकारी एजेंसियों के हवाले कर देना चाहिए। पैनल का कहना है कि यह कदम उठाने पर ही सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पीडीएस) यानी राशन की दुकानों के जरिए लोगों को होने वाले अनाज वितरण में गड़बडिय़ां रोकी जा सकेंगी।
न्यायमूर्ति डीपी वधवा की अगुआई वाली कमेटी का कहना है कि एफपीएस के मालिकों, ट्रांसपोर्टरों, नौकरशाहों और राजनीतिज्ञों में नि:संदेह साठगांठ है। इस पैनल का कहना है कि इस तरह के भ्रष्टाचार पर लगाम तभी लग सकेगी जब उसकी सिफारिशों पर अमल किया जाएगा। समिति ने कहा, 'यह सभी को पता है कि एफपीएस ही भ्रष्टाचार का केंद्र बिंदु है। एफपीएस के जरिए ही इसके मालिक, ट्रांसपोर्टर, भ्रष्ट अधिकारी और राजनेता आपस में साठगांठ करके आम जनता को चूना लगाते हैं।' वधवा समिति का कहना है, 'राशन की दुकानों में उपलब्ध होने वाले अनाज को काला बाजार में भेज देने से वास्तविक लाभार्थी इसे पाने से वंचित हो जाते हैं। ऐसे में विकल्प यही है कि सरकार या तो एफपीएस के भ्रष्ट कामकाज को आगे भी जारी रखे अथवा उनका संचालन वह खुद अपने हाथों में ले ले। ऐसे में जरूरत इस बात की है कि एक नागरिक आपूर्ति निगम का गठन किया जाए जो एक स्वतंत्र निकाय के तौर पर एफपीएस पर राशन के अनाज का वितरण करे और मौजूदा एफपीएस का संचालन अपने हाथों में ले ले।' समिति ने सुप्रीम कोर्ट को पेश की गई अपनी सिफारिशों में कहा है कि एफपीएस का संचालन राज्य स्तरीय निगमों, पंचायती राज संस्थानों, सहकारी समितियों और पंजीकृत महिला स्वयं सहायता समूहों द्वारा किया जाना चाहिए।