नई दिल्ली. जम्मू-कश्मीर में आई बाढ़ यहां बीते 60 सालों में आई सबसे बड़ी मौसमी आपदा है। आखिर ऐसा क्या हुआ कि धरती का जन्नत कहलाने वाले इस क्षेत्र को इन हालात का सामना करना पड़ रहा है? जानकार मानते हैं कि श्रीनगर और आसपास के इलाकों के अधिकारियों ने स्थानीय झीलों और जलाशयों के संरक्षण के बारे में लापरवाही बरतकर इस तरह की आपदा को दावत दी। राज्य सरकार की ओर से कराई गईं कई स्टडीज और कुछ साइंटिफिक रिपोर्ट्स में इस बारे में सचेत भी किया गया, लेकिन कोई कदम नहीं उठाया गया। नतीजे हमारे सामने हैं। सिर्फ
जम्मू-कश्मीर ही क्यों, बीते साल उत्तराखंड में बरपे कुदरत के कहर को कैसे भुलाया जा सकता है? मतलब साफ है, प्राकृतिक संसाधनों के लगातार संदोहन की वजह से जलवायु में आ रहे परिवर्तन की वजह से ही इस तरह की घटनाएं बढ़ रही हैं। सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरमेंट की एक रिपोर्ट के मुताबिक, बीते 110 साल में देश में मौसमी आपदाओं का सालाना औसत करीब 140 गुना बढ़ा है।
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सूख गए 50 फीसदी झील, तालाब
जीआईएस लैब और जम्मू-कश्मीर स्टेट रिमोट सेन्सिंग सेंटर की ओर से कराई गई स्टडी के मुताबिक, श्रीनगर में मौजूद 50 पर्सेंट से ज्यादा झील और वाटर बॉडीज बीती शताब्दी में लुप्त हो गए। ये वॉटर बॉडीज बाढ़ का बहुत सारा पानी अपने अंदर होल्ड कर सकते थे। बता दें कि एक शताब्दी पहले श्रीनगर शहर का बहुत सारा इलाका जलाशयों, झीलों आदि से घिरा हुआ था। वैज्ञानिकों ने 1911 से 2004 के बीच झीलों के सिकुड़ने की सैटेलाइट स्टडी की। जम्मू-कश्मीर रिमोट सेंसिंग सेंटर के साइंटिस्ट हुमायूं राशिद और गौहर नसीम के मुताबिक, श्रीनगर में जलाशयों के सूखने की वजह से शहर की आबोहवा पर बुरा असर पड़ा है।
रिपोर्ट के मुताबिक, बाढ़ के दौरान जलाशयों में बालू भरना आम बात है, लेकिन बढ़ते अतिक्रमण, मिट्टी पाटे जाने, पौधे लगाने, निर्माण कार्य होने की वजह से श्रीनगर में मौजूद जलाशय और वाटर बॉडीज खत्म होते गए। इनके खत्म होने से एक और बड़ी समस्या जो शहर के सामने आई, वह है ड्रेनेज या जल निकासी की। साइंटिस्ट्स का कहना है कि हाल के सालों में घाटी में दो-तीन दिन की बारिश से झेलम नदी में बाढ़ आने का खतरा मंडराने लगता है, लेकिन 2-3 दशक पहले, ऐसा नहीं होता था।
पावर प्रोजेक्ट्स बने कारण
साउथ एशिया नेटवर्क ऑन डैम्स, रिवर्स एंड पीपुल के कॉर्डिनेटर हिमांशु ठक्कर के मुताबिक, इलाके में लगे हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट भी इस आपदा के लिए जिम्मेदार हैं। इन प्राजेक्ट्स की वजह से नदियों पर बांध बनाने, वनों की कटाई, नदियों के दिशा मोड़ने की प्रवृत्ति बढ़ी। ठक्कर मानते हैं कि इन्हीं प्रक्रियाओं की वजह से भूस्खलन और अचानक से बाढ़ आने की घटनाओं में बढ़ोत्तरी हुई है।
शहरीकरण भी वजह
इंडियन नेशनल ट्रस्ट फॉर आर्ट एंड कल्चरल हेरिटेज से जुड़े सलीम बेग कहते हैं कि पहले नदी के करीब के इलाकों में वही रहते थे, जिनकी आजीविका नदी से जुड़ी होती थी। ऐसे में बाढ़ आदि की चेतावनी मिलने पर उन्हें तुरंत इलाका छोड़ने के लिए कहा जाता था। रिहाइशी इलाके ऊंचे जगह पर बनाए जाते थे। बेग के मुताबिक, पहले जो जमीनें प्राकृतिक ढंग से नदी का पानी सोखते थे, उन पर अब इंसानी कॉलोनियां बस गई हैं। इसके अलावा, पानी निकासी की जगहों पर सड़कें बन गई हैं। निचले इलाकों में बने ऐसे 450 गांव इस बार आए बाढ़ में डूब चुके हैं।
मानसून का अंदाजा लगाना मुश्किल
बहुत सारे वैज्ञानिकों का मानना है कि उनके लिए मानसूनी बारिश के स्तर का अंदाजा लगाना दिन प्रतिदिन मुश्किल होता जा रहा है। उदाहरण के तौर पर, श्रीनगर में 5 सितंबर को होने वाली औसत बारिश का स्तर 0.4 मिमी होता है, लेकिन इस साल यह 49 मिमी रही जो औसत से करीब 122 गुना ज्यादा है।
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