फोटो: सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश पद की शपथ लेते जस्टिस एचएल दत्तू।
नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट के जज एच एल दत्तू ने रविवार को देश के 42वें चीफ जस्टिस पद की शपथ ली। राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने राष्ट्रपति भवन में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान उन्हें पद की शपथ दिलाई। इससे पहले शनिवार को पूर्व चीफ जस्टिस आरएम लोढ़ा सेवानिवृत्त हो गए थे। दत्तू दिसबंर 2008 में सुप्रीम कोर्ट के जज बने थे। दत्तू शुरुआत में वकील की जगह डॉक्टर या इंजीनियर बनना चाहते थे, लेकिन परिवार की आर्थिक स्थिति बेहतर नहीं होने की वजह से उन्होंने वकालत का पेशा अपनाया।
बहन की पढ़ाई के लिए दी कुर्बानी
चिकमंगलूर (कर्नाटक) के इडिगा समुदाय में 3 दिसंबर 1950 में जन्मे दत्तू ने 1975 में बेंगलुरु में वकालत शुरू की थी। वह दिसंबर 1995 में कर्नाटक हाईकोर्ट के जज बने। फरवरी 2007 में छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस बने। उसी साल मई महीने में उन्हें केरल हाईकोर्ट का चीफ जस्टिस बनाया गया था। दिसंबर 2008 में वह सुप्रीम कोर्ट के जज बने। उनके पिता शिक्षक थे लिहाजा घर में शुरू से ही पढ़ाई का माहौल था। पिता को दत्तू के साथ बेटी को भी पढ़ाना था। बेटी डॉक्टर बनना चाहती थी। चाहते तो दत्तू भी यही थे कि डॉक्टर या इंजीनियर बनें, लेकिन पारिवारिक स्थिति ऐसी नहीं थी कि पिता दोनों को डॉक्टर या इंजीनियर बना सकें। ऐसे में दत्तू ने पिता से कहा कि आप बहन को एमबीबीएस करने दीजिए, मैं कुछ और कर लूंगा। इसके बाद दत्तू ने लॉ किया और काबिल वकील बने।
गरीबों की फीस नहीं लेते थे
एच एल दत्तू अपने खानदान के पहले व्यक्ति रहे, जिन्होंने वकालत के पेशे को अपनाया। कर्नाटक में उन्हें एक सुयोग्य- गैर राजनीतिक वकील माना जाता है। बेंगलुरु में प्रैक्टिस करते हुए उन्होंने सिविल, क्रिमिनल, कॉन्स्टीट्यूशनल और टैक्सेशन के मुकदमे लड़े। बेंगलुरु में लोग आज भी याद करते हैं कि गरीबों के पक्षधर दत्तू अनेक मुकदमों में फीस भी नहीं लेते थे। जस्टिस दत्तू के बहुत कम मित्र हैं और खाली वक्त में अकेले रहना पसंद करते हैं। अक्सर ऐसा होता है कि शुक्रवार शाम को जिस कार से वह सुप्रीम कोर्ट से घर पहुंचते हैं वह कार सीधे सोमवार की सुबह सुप्रीम कोर्ट के लिए ही निकलती है।