युवा भारत की अंतिम चट्टान से योद्धा संन्यासी विवेकानंद की पुकार

9 वर्ष पहले
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कन्याकुमारी. सुबह साढ़े छह बजे। रॉक के पीछे जब सूर्य उगा तो हर जाति-धर्म और भाषा-बोली के करबद्ध लोग अपलक निहारते दिखे। विवेकानंद उसी सूर्य के प्रचंड प्रतीक बनकर यहां जगमगा रहे हैं। रॉक पर एक घुप्प अंधेरा कमरा है। युवाओं का एक समूह हल्की हरी रोशनी में ओम अक्षर के समक्ष गहन मौन में है। 26 वर्षीय सॉफ्टवेयर इंजीनियर आनंदा इन्हीं में से एक हैं। वे कहते हैं, यह जगह अद्भुत ऊर्जा से भरी है। यहां की सालाना परिक्रमा मेरे जीवन का नियमित क्रम है। गणेशन यहीं के शौकिया फोटोग्राफर हैं। वे कहते हैं कि पर्यटन स्थल के रूप में कन्याकुमारी की प्रसिद्धि सबको मालूम है, लेकिन उन्हें पहली बार स्वामी विवेकानंद के प्रति युवाओं की दीवानगी का अंदाजा इस समय हुआ है। बाहर से पहली दफा आने वाले सिर्फ एक ही सवाल पूछ रहे हैं, रॉक के अलावा विवेकानंद के चरण और कहां-कहां पड़े थे? एक दिन बंगाल मूल का एक युवा संन्यासी कन्याकुमारी के इस छोर पर आया था। वह उस चट्टान का स्पर्श करना चाहता था, जिसके बारे में मान्यता है कि कभी देवी ने शिव के लिए यहां साधना की थी। नाविकों ने पैसे मांगे। झोली खाली थी। संन्यासी मुस्कराया। उफनते समुद्र में छलांग लगा दी। ढाई फर्लांग तैरकर गया। तीन दिन ध्यान में बिताए। लौटा। वह स्वामी विवेकानंद थे। उम्र थी सिर्फ 29 साल। दिन था 25 दिसंबर 1892।
समुद्र के बीच यह चट्टान आज के युवा भारत का सबसे महान् तीर्थ है। आदि शंकराचार्य के बाद देश के कोने-कोने में घूमने वाले इकलौते संन्यासी स्वामी विवेकानंद को भारत के आखिरी सिरे को देखने की इच्छा यहां ले आई थी। आज दुनिया भर से हर साल करीब 16 लाख लोग इस दक्षिणी कोने में आते हैं। ज्यादातर युवा। विवेकानंद रॉक के नाम से विश्वप्रसिद्ध वह शिला इस वक्त हर पल हजारों कैमरों की लाखों तस्वीरों में सहेजी जा रही है। चारों ओर से उफनती अथाह जलराशि के बीच विवेकानंद ने ठीक इसी जगह पर समाधि के अनुभव लिए थे। उनकी ऊर्जा तीन समंदरों के इस मिलन बिंदु पर युवाओं को एक पुकार की तरह है। ऑफ सीजन के बावजूद इस समय देश भर के लोगों का यहां मेला लगा है। शहर में जहां नजर दौड़ाइए विवेकानंद ही आंखों के सामने होंगे। इतनी तस्वीरें और होर्डिंग लगे हैं। भारत की भौगोलिक सीमाएं कन्याकुमारी के इस समुद्री सिरे पर आकर समाप्त होती हैं। अंतिम चट्टान पर स्थापित आकर्षक प्रतिमा से जैसे विवेकानंद स्वयं कश्मीर तक विस्तृत राष्ट्र की अपनी संतानों को गौर से देख रहे हैं। आजादी के 65 साल बाद पहली बार आक्रोशित और बेचैन युवा उनकी आंखों में हैं। वह फौलाद सा बल उन्हें युवा भारत में दिखाई दे रहा होगा, जैसा वे चाहते थे। मूर्ति में उनकी मुस्कराहट अनायास नहीं है।
(तस्वीर: कन्याकुमारी स्थित विवेकानंद रॉक। फोटोग्राफर-अनिल शर्मा)