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- रखो ख्याल बुजुर्गों का, क्योंकि कभी तुम भी बूढ़े हो जाओगे...
रखो ख्याल बुजुर्गों का, क्योंकि कभी तुम भी बूढ़े हो जाओगे...
“उम्र बढ़ने पर हमें कुछ यूं इशारा हो गया, हमसफर इस जिंदगी का और प्यारा हो गया’ सचमुच बुढ़ापे में इंसान को अपना जीवन साथी अर्थात प|ी ही एकमात्र सहारा बनती है। कमोबेश आज के परिवेश में जिस तरीके से संयुक्त परिवार टूट रहे हैं और एकल परिवार बढ़ते जा रहे हैं, ऐसे में सीनियर सिटीजंस का सहारा वृद्ध घर बन रहे हैं। काफी ऐसे भी हैं जो परिवार से ठुकराए जाने के बाद दर-दर की ठोकरें खाते हैं। हालांकि उनको दर-ब-दर करने वाले बच्चे नहीं जानते की वह भी कभी इस उम्र को पहुंचेंगे। इसी थीम पर बुना गया पंजाबी नाटक “शूगर फ्री’ पंजाब नाटशाला में पेश किया गया। जगदीश सचदेवा लिखित/निर्देशित तथा नाट घर अमृतसर की इस पेशकारी की खासियत यह है कि इसके सभी कलाकार तकरीबन सीनियर सिटिजन हैं।
नाटक में घर से बेघर तथा घर में रहते हुए बेकद्र हुए बुजुर्गों की मानसिक स्थिति को बड़े ही जीवंत तरीके से पेश किया गया है। उम्र भले ही ढल जाए लेकिन इंसान के दिल में जवानी तथा बचपन की ही तरह से सारे भाव और सोच जिंदा रहते हैं। वह भी हंसना/खेलना और खिलखिलाना चाहते हैं, लेकिन हालात ऐसे पैदा हो जाते हैं कि वह तन्हाई की जिंदगी जीने को मजबूर हो जाते हैं। वृद्ध घर में या फिर सड़क पर जब मिलते हैं तो अपनी पीड़ा बयां कर जाते हैं। नाटक के आखिर में यह संदेश दिया गया है कि बुढ़ापा जश्न होना चाहिए मगर देश का दुर्भाग्य है कि हमारे यहां इसे संताप और अभिशाप समझा जाता है। जिन मां-बाप ने बच्चों के लिए अपनी पूरी जिंदगी घुला दी वही बुढ़ापे में बेसहारा हो जाते हैं। नाटक को हल्के-फुल्के अंदाज में पेश किया गया है। इसमें अगर दर्शकों के आंखों में आंसू आते हैं तो पेशकारी के दौरान किए जाने वाले जुमले हंसा-हंसा कर लोट-पोट करते हैं। नाटक में विजय शर्मा, इंदरजीत सहारन, किशोर शर्मा, गुलशन सग्गी, हरिंदर सोहल, अश्विनी पराशर, अमरपाल, सीमा शर्मा, हरमेश शर्मा, विनोद ने किरदार निभाया है, जबकि संगीत है हरिंदर सोहल का। नाटक रविवार को भी पेश किया जाएगा।