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मां तुझे सलाम : सुहाग कुर्बान, अब बेटे-पोतों को बॉर्डर पर भेजेंगी
पंजाबी सैनिक विधवाओं ने जताई अपनी नई पीढ़ी को फौज में भर्ती कराने की इच्छा
शिवराजद्रुपद | खासा/अमृतसर
राहकुर्बानियों की वीरान हो, तुम सजाते ही रहना नए काफिले... जंग में शहीद होते एक फौजी की सोच पर आज भी पंजाब के लोग पहरा बैठाते हैं। साहस, त्याग और बलिदान की इस परंपरा को आगे बढ़ाने में उन महिलाओं की कमी नहीं है, जिन्होंने देश के लिए लड़ी गई जंगों में अपना सुहाग या फिर बेटा खोया है।
सलाम है उन मांओं और सैनिक विधवाओं को, जिन्होंने खासा मिलिटरी स्टेशन में आयोजित एक्स-सर्विस मैनों की रैली में अपने बेटे या फिर पोते को सेना में भर्ती कराने की मांग उठाई।
शहादत से मिलती है प्रेरणा : अभी जेएंडके में आतंकवादियों से लोहा लेते शहीद हुए जवानों चिता की आग ठंडी भी नहीं हो पाई है कि ऐसी सैनिक विधवाओं ने यह जज्बा दिखाया है। यह वह वीर माताएं हैं, जिन्होंने गोलियों से छलनी और बम से उड़े अपनों के शरीर के टुकड़े देखे हैं, लेकिन उनकी देशभक्ति का जज्बा कम नहीं हुआ है। इन माताओं का कहना है कि माना कि सिर से साईं का साया उठ गया या फिर कोख सूनी हो गई, मगर मुल्क के लिए दी गई कुर्बानी पर फख्र है और यही उनकी प्रेरणा का स्रोत भी। अपने 20 वर्षीय पोते गुरशरण सिंह को फौज में भर्ती कराने की उम्मीद से आई मजीठा निवासी निरंजन कौर ने बताया कि उनके पति रूप सिंह 1971 में पाक के साथ हुई जंग में शहीद हुए थे। उस वक्त उनका बेटा सतविंदर सिंह पांच साल का था। बड़ी मुश्किल से जिंदगी काटी, बेटा उस लायक नहीं था कि फौज में जाए। पति के जाने के बाद यही तमन्ना रही है कि घर में कोई वर्दी पहने, जिसे वह पोते के जरिए पूरा करना चाहती हैं।
यहीहोगी सच्ची श्रद्धांजलि
गांवदरिया मूसा, अमृतसर की रहने वाली दविंदर कौर सेना के बुलावे पर यहां आई थीं। उनके साथ उनका दस वर्षीय बेटा कर्णदीप भी मौजूद था। उनके पति सुरजीत सिंह 2005 में बारामूला में आतंकियों के साथ लोहा लेते शहीद हुए थे, उस वक्त बेटा सवा महीने का था। दविंदर का कहना है कि फौज से मिलने वाली पेंशन से गुजारा होता है। वह भले ही चले गए, मगर उनके द्वारा दिखाई गई देशभक्ति की राह पर बेटे को चलना सिखा रही हैं। तरनतारन के गांव नत्थू चक निवासी हरभजन कौर की शादी के कुछ दिन बाद ही पति इंदर सिंह चीन की जंग में शहीद हुए थे, फिर उनकी शादी देवर से हो गई। वह कहती हैं कि बच्चे