आज देश मांग रहा है एक और गदर
आज प्रस्तुत होगा नाटक \\\"करम-भरम\\\'
फेस्टिवलके तहत मंगलवार को उज्जैन के थिएटर ग्रुप अभिनव रंगमंच की तरफ से नाटक करम-भरम पेश किया जाएगा। फेस्टिवल के आयोजक तथा शिरोमणि नाटककार केवल धालीवाल ने बताया कि नाटक का निर्देशन शरद शर्मा ने किया है।
12वंे थिएटर फेस्टिवल के तहत नाटक इक होर गदर का मंचन करते कलाकार।
भास्कर न्यूज | अमृतसर
100साल पहले 1914 में देश की आजादी के लिए गदर पार्टी का गठन करके हमारे लोगों ने मुल्क को आजाद कराने की लड़ाई शुरू की। खून बहाया, खुद मिटे और तत्कालीन हुक्मरानों को मिटा भी दिया और मिल गई आजादी, लेकिन सही मायने में क्या वह आजादी आज के परिवेश में कहीं दिख रही, नहीं, हम आज भी उसी गुलामी की जंजीरों में जकड़े हुए हैं।
गोरों के रूप में काले हुकूमत कर रहे हैं। हमारा सारा सिस्टम उसी ब्रिटिश कालीन दौर का हिस्सा बना हुआ है। ऐसा महसूस होने लगा है कि देश को फिर कहीं कहीं गदर की जरूरत है। इसी सोच को जीवंत करता पंजाबी नाटक इक होर गदर का मंचन सोमवार को विरसा विहार में किया गया।
यहां पर मंच रंगमंच की तरफ से केवल धालीवाल की पहल पर चल रहे चल रहे 12वें थिएटर फेस्टिवल के तहत इस नाटक को पेश किया अदाकार मंच मोहाली के कलाकारों ने। नाटक को लिखा और निर्देशित किया है डॉ. साहिब सिंह ने।
नाटक में 1914 के उस दौर को दिखाया गया है, जिसमें देश के लोग रोजी-रोटी कमाने को विदेश जाते हैं, लेकिन वहां जाने पर उनको पता चलता है कि यहां भी उनकी स्थिति कुछ ठीक नहीं है और उसका जिम्मा अंग्रेजी हुकूमत को जाता है। इसके बाद यह लोग एकजुट होते हैं और गदर पार्टी का गठन करते हैं। इसके बाद शुरू हो जाता है संघर्ष आजादी के लिए। 100 साल बाद 2014 में फिर जब समीक्षा होती है देश के हालात की तो स्थिति वहीं की वहीं नजर आती है। कहानी में आज विदेशों की तरफ पलायन कर रही जवानी, गरीबी, अनपढ़ता, बेरोजगारी और नशा आम इंसान की लाचारी और बेबसी को बयां करते हैं। कलाकारों ने इसे बड़े ही जीवंत तरीके से पेश किया है।
साहिब सिंह कहते हैं कि तब सिर्फ एक ईस्ट इंडिया कंपनी आई थी देश को गुलाम बनाने और आज मल्टीनेशनल कंपनियों की कतार लगी हुई है। उनका कहना है कि हमने दोनों काल खंडों को बड़ी ही बारीकी से परखा तो महसूस हुआ कि देश को कहीं कहीं फिर एक गदर की जरूरत है, जो हमारे शहीदों की सोच वाले मुल्क का सृजन कर सके