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6 महीनों में ही कई जगह से धंसी इंटरलॉकिंग टाइलें
साहिल शर्मा/शिवराज द्रुपद | अमृतसर
रणजीतएवेन्यू डी-ब्लॉक में सड़कों के किनारे छह महीने पहले लगी इंटरलॉकिंग टाइलें जगह-जगह से धंसनी और उखड़ने लगी हैं। मेंटेनेंस के प्रति अफसरों की अनदेखी के कारण यह टाइलें विकास कार्यों की पोल खोल रही है। कही टाइलें एक-एक फीट तक जमीन में धंस गई हैं, तो कहीं इन पर घास उगना शुरू हो गया है।
इंजीनियरों के अनुसार इंटरलॉकिंग टाइलें लगाने के लिए कॉम्प्रेशन करके प्रॉपर बैड तैयार किया जाता है। बैड बनाने के लिए रोढ़ी डालकर कुटाई की जाती है, फिर मिट्टी डालकर रोलर चलाया जाता है।
रोढ़ी और मिट्टी अच्छी तरह से मजबूत होने बाद मोटी रेत डालकर टाइलों को लगाया जाता है। टाइलोंं को लगाने के लिए सीमेंट नहीं लगाया जाता, केवल आपस में जोड़ दिया जाता है, जिस जगह को टाइलें लगाई जाती है, अगर वहा कोई सीवेरज या कोई अन्य काम करना हो, तो टाइलों को हटाकर काम किया जा सकता है।
इंटरलॉकिंग टाइलें लगाने से पहले रोढ़ी और मिट्टी का बैड अच्छी तरह से तैयार होने से टाइलें जमीन में धंस जाती है। कई बार सीवरेज नीचे बैठने के कारण भी टाइलें धंस जाती है।
रिटेंशनपीरियड तक टाइलें खराब हुई तो ठेकेदार जिम्मेदार : इम्प्रूवमेंटट्रस्ट के एसई राजीव सेखड़ी ने बताया कि टाइलें लगाने का काम पूरा होने के बाद एक साल का रिटेंशन पीरियड होता है, जिसमें ठेकेदार से 10 प्रतिशत सिक्योरिटी विभाग के पास जमा रहती है। अगर कही भी टाइलें खराब होती है, तो ठेकेदार उसे ठीक करवाता है। टाइलों का ज्यादा नुकसान होने पर ठेकेदार की सिक्योरिटी जब्त कर ली जाती है और बिना पेमेंट के ठेकेदार को रिपेयर करनी होती है।
कंस्ट्रक्शन के काम से जुड़े दलबीर सिंह गुमानपुरा का टाइल्स बारे कहना है कि इनको जहां भी लगाया जाता है पहले उस पर बेड दरेसी फेरी जाती है और उसके लिए पहले लाल मिट्टी बिछाई जाती है। इसके बाद रोलर चलाया जाता है। फिर 1/8/16 के अनुपात में सीमेंट/रेत और लाल रोड़ी की चार से छह इंच मोटी पर्त डाली जाती है और उसकी कुटाई की जानी चाहिए। इसके बाद टाइल लगानी चाहिए। उनका कहना है कि यहां जो काम हो रहा है उसमें तो अच्छी क्वालिटी की मिट्टी डाली जा रही है और ना ही अन्य मानकों को पूरा किया जा रहा है। सिर्फ मिट्टी बिछा कर उस पर कंकरीट में रेत मिला कर बिछा दिया जाता है और उस पर हल्का-फुल्का प्रेस करके टाइल लगा दी जा रही है।
टाइल्स की क्वालिटी में फर्क
टाइल्सकी क्वालिटी बारे ला प्रीमियर के राकेश तथा रक्षदीप सिंह का कहना है कि आमतौर पर टाइलों की मोटाई 100, 80, 60 एमएम होती है। इनका कहना है कि गड़बड़ी इनके निर्माण में होती है। आमतौर पर जो टाइल बनाई जाती है वह प्लास्टिक की डाई से मगर क्वालिटी वाली टाइल फाइबर ग्लास की डाई में तैयार होती है। बढ़िया क्वालिटी की टाइल में सीमेंट की ज्यादा मात्रा, कुछ रेत, सफेद सीमेंट और लिक्विड केमिकल तथा रंग को मिक्स किया जाता है। इसमें रंग को पक्का करने के लिए तैयार करते वक्त ही 10 एमएम मोटी रंग की लेयर तैयार की जाती है। इसके विपरीत आम टाइल्स में मैटीरियल हल्का मिलाया जाता है और रंग तथा केमिकल की बजाय सांचे से निकालने के बाद उस पर रंग पोत दिया जाता है। उक्त लोगों ने बताया कि हल्की डाई वाली टाइल में तैयार होने के बाद कर्व जाता है और वह सही तरीके से नहीं बैठती नतीजतन टूट जाती है और उससे तैयार फर्श पर पानी जमा होता है। जबकि क्वालिटी वाली टाइल में ऐसा नहीं होता।
शहर में जगह-जगह लगाए जा रही इंटरलॉकिंग टाइल्स के टूटने और धंसने के कारण यह काम सवालों से घिर गया है। माहिरों का मानना है कि इन टाइलों को तैयार करने में क्वालिटी का ख्याल नहीं रखा जाता तो बिछाते वक्त भी मानदंडों का पालन नहीं किया जाता। फोटो| भास्कर
^रणजीत एवेन्यू में जिन प्वाइंटों पर टाइलें खराब हो गई हैं, उसे रिपेयर करने के लिए ठेकेदार को बोल दिया है। सीवरेज नीचे बैठने के कारण टाइलें धंस गई हैं।’ राजीवसेखड़ी, एसई, इम्प्रूवमेंट ट्रस्ट
^जहां भी इंटरलॉकिंग टाइलें जमीन में धंसी हैं या लेवल किए बिना लगाई हैं। उसे दोबारा रिपेयर करने लगाने के निर्देश दिए गए हैं। टाइलों की क्वालिटी चेक करने के लिए सैंपल लेबोरेटरी में भेजे गए हैं। अगर सैंपल गलत निकले तो ठेकेदार और अफसरों पर कार्रवाई होगी।\\\' अनिलजोशी, लोकल बॉडी मंत्री