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  • वर्ष 8 } अंक 345 } कुल पृष्ठ 24 } मूूल्य ~ 2.50 }रसरंग आज

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7 वर्ष पहले
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मंदिरोंं और जटिल दर्शनशास्त्र की कोई आवश्यकता नहीं है। मस्तिष्क और हृदय ही हमारा मंदिर है। और दयालुता जीवन-दर्शन है।

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