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आधा बदन बेजान, मगर दविंदर ने जीती जिंदगी की जंग

5 वर्ष पहले
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अमृतसर। अगर मेज के पीछे आपको उनकी वह ह्वीलचेयर दिखाई न दे, जिस पर वह बैठे हैं, तो आप उन्हें गजब की ऊर्जा और जोश से भरे सफल कारोबारी के तौर पर देखेंगे। मगर सच यह है कि वे चल-फिर नहीं सकते। लेकिन उन्होंने हाल ही में “ताज-आगरा कार रैली-2016” जीत कर साबित कर दिया है कि आपका दृष्टिकोण रचनात्मक है और सीने में हिम्मत है तो टूटा हुआ बदन भी मुश्किलों को मात देकर चैंपियन बन सकता है।
इतना ही नहीं, वह अपने जैसे लोगों को बता रहे हैं, शरीर का जो हिस्सा साथ छोड़ गया है, उसे भूल जाओ और जो बचा है, उसे इतना मजबूत बना लो कि आप आम जिंदगी जी सको। हम बात कर रहे हैं 42 वर्षीय दविंदर सिंह की। जब 23 साल के थे और एग्रीकल्चर में बीएससी कर रहे थे, तब 1997 में एक सड़क हादसे ने उनकी रीढ़ तोड़ कर कमर से निचले हिस्से को हमेशा के लिए बेजान कर दिया। डॉक्टरों ने आॅपरेशन किया और आराम करने की सलाह दी। यह नहीं बताया कि वे आगे किस तरह से बेहतर जिंदगी जी सकते हैं। ऐसे अनिश्चितता के माहौल में उन्हें लगा, जैसे सब कुछ खत्म हो गया है और हालातों से समझौता करने के अलावा कोई चारा नहीं बचा।
फिर एक दिन समय ने अचानक करवट ली, दिल्ली के एक प्रसिद्ध अस्पताल ने रीढ़ की चोट का शिकार बने लोगों के लिए अमृतसर में एक पुनर्वास कैंप लगाया। दविंदर उसमें शामिल हुए, मगर प्रभावित न हो सके। लिहाजा, उन्होंने दिल्ली जाकर उसी अस्पताल के पुनर्वास प्रोग्राम में भाग लेने का निर्णय किया। इस एक महीने के प्रोग्राम ने उनके नजरिए को बदल कर रख दिया। वे निराशा से निकल कर कुछ अच्छा करने का सोचने लगे। उन्होंने प्रण लिया कि अब उन्होंने आगे का जीवन परिवार और दोस्तों की मदद से अपने दम पर जीना है। इस तरह दविंदर ने ह्वीलचेयर को अपनी टांगें बनाया। कार के क्लच और ब्रेक को पैरों के बजाय हाथों से चलाने लायक बनाया और ज्यूलरी के अपने पुश्तैनी धंधे को आगे बढ़ाने में जुट गए। कुछ अर्सा पहले घर वालों के आग्रह पर उन्होंने विवाह कर लिया और एक बेटे के पिता बने।
अब लोगों को करते हैं प्रेरित
थोड़े से समय में ही जीवन में स्थिर होने के बाद दविंदर ने अपने जैसे लोगों को आत्मनिर्भर बनने के लिए “स्पाइनल कार्ड इंजरी एसोसिएशन” का गठन किया, जिसमें आज 200 से ज्यादा मेंबर हैं। यह संस्था विपरीत परिस्थितियों से लड़ने की सीख तो देती है, साथ ही सभी सदस्यों को इस शर्त के साथ आधुनिक ह्वीलचेयर उपलब्ध कराती है कि आगे जाकर वे भी किसी जरूरतमंद को ऐसी ही ह्लीलचेयर डोनेट करेंगे।
दविंदर कहते हैं, रीढ़ के हरेक मरीज को पुनर्वास कार्यक्रम में भाग लेना चाहिए। उसके बाद पॉजिटिव रवैये, दृढ़ इच्छा शक्ति और प्रापर काउंसिलिंग से जीवन की लड़ाई को आसानी से जीता जा सकता है, मगर यह सब परिवार और मित्रों की मदद के बगैर संभव नहीं।
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