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गांवों में जन्मे, तंगी में पले, आईआईएम में पढ़कर बनेंगे मैनेजमेंट गुरु

गरीबी और पिछड़ापन उनके लिए अभिशाप है, जो हालातों से समझौता करते हैं। कर्मवीरों के लिए यह संघर्ष की भट्ठी है, जिसमें तप कर वह कुंदन की तरह निखरते हैं।

Dainik Bhaskar

Sep 12, 2016, 05:13 AM IST
IIM management study
अमृतसर। गरीबी और पिछड़ापन उनके लिए अभिशाप है, जो हालातों से समझौता करते हैं। कर्मवीरों के लिए यह संघर्ष की भट्ठी है, जिसमें तप कर वह कुंदन की तरह निखरते हैं। ऐसे ही कुंदन के नाम हैं, इंडियन इंस्टीट्यूट अॉफ मैनेजमेंट, अमृतसर के सेकेंड बैच के स्टूडेंट आलोक कुमार मिश्रा उत्तर प्रदेश, विष्णु सिन्हा झारखंड और पुतुल द्वारिक असम। यह तीनों ही ऐसे पिछड़े इलाकों साधन विहीन परिवारों से हैं, जहां पर दो वक्त की रोटी जुटा पाना मुश्किल है, आईआईएम जैसे इंस्टीट्यूट में पढ़ाई करना तो सपने की बात है।

गांव में कोचिंग, जुनून से पहुंचे यहां
कैट क्लियर करके 2016 के बैच में आईआईएम के स्टूडेंट बने देवरिया उत्तर प्रदेश के आलोक कुमार मिश्रा, किसान परिवार से हैं। प्रॉपर्टी के नाम पर चार एकड़ जमीन है। पिता खेती करते हैं और बड़ा भाई दिल्ली में कोचिंग करता है। गांव के स्कूल से 12वीं और फिर डिग्री कॉलेज से बीए किया। इसका खर्च निकालने के लिए वह घर पर ही बच्चों को कोचिंग देते रहे।
2015 में दिल्ली भाई के पास आए और वहीं पर कैट की तैयारी शुरू की, एग्जाम दिया तो 98.7 फीसदी मार्क्स आए और आईआईएम के दाखिले का रास्ता खुल गया। वह बताते हैं कि फीस देने के पैसे नहीं थे , नतीजतन दाद की कुछ जमा पूंजी और कुछ रिश्तेदारों से कर्ज लेकर रुपए जुटाए। वह कहते हैं कि पढ़ाई पूरी करने के बाद गांव में ही स्कूलों की श्रृंखला खोलेंगे और अपने जैसे बच्चों का भविष्य संवारेंगे।

रिश्तेदार ने दिया सहारा, लोन लेकर आए
झारखंड के ग्रामीण इलाके से संबंधित विष्णु सिन्हा के भी खेती के नाम पर जमीन के कुछ टुकड़े। पिता खेती करते हैं बड़ा भाई घर पर ही कोचिंग करके गुजारा करते हैं। गांव से दसवीं पास किया फिर दिल्ली गए और वहां पर एक रिश्तेदार ने 12वीं तक की पढ़ाई करवाई, फिर आसनसोल चले गए वहां नौकरी की और बीटेक किया।
इसके बाद आईआईएम में जाने की इच्छा जागी। कैट की तैयारी की और जब सिलेक्ट हुआ तो नौकरी छोड़ दी। दाखिले के लिए बैंक से चार लाख का लोन लिया और अब यहां पर पढ़ाई कर रहे हैं। वह कहते हैं कि अगर दान करना है तो इंसान को रोजगार दान करो या फिर उसे रोजगार लायक बनाओ। वह कहते हैं कि पढ़ाई पूरी करने के बाद गांव लौट जाएंगे और अपने जैसे लोगों को आगे बढ़ने के लिए गुर सिखाएंगे।

आगे बढ़ने के लिए की नौकरी
पुतुल द्वारिक असम के दूरस्थ इलाके के रहने वाले हैं। इनके खेती के नाम पर 10 एकड़ जमीन है, जिसमें सिर्फ धान उगता है। पिता किसानी करते हैं और बड़ा भाई उनकी मदद करता है। गांव से 12वीं की और असम गए, जहां पर प्राइवेट नौकरी की और फिर ग्रेजुएशन किया। वह बताते हैं कि चार साल तक नौकरी करते रहे मगर मन में आगे बढ़ने की तमन्ना थी और पैसे भी जोड़ते रहे।
इसके बाद कैट का एग्जाम दिया और 68 फीसदी मार्क्स आए। ट्राइवल एरिया का होने के नाते कोटे में सिलेक्शन हो गया। आईआईएम ज्वाइन करने में दिक्कत इसलिए नहीं हुई क्योंकि नौकरी के दौरान फीस भरको दो लाख रुपए जोड़ लिया था। वह कहते हैं कि यहां से निकलने के बाद जब जॉब मिलेगी तो इसकी कमाई से अपने इलाके के उन बच्चों का सहारा बनेंगे जो पैसे के अभाव में आगे नहीं पढ़ पाते।
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