अमृतसर। महाराजा रणजीत सिंह के जरनैल शाम सिंह अटारीवाला 10 फरवरी 1846 को सभरावां की जंग में अंग्रेजी फौज से लोहा लेते हुए शहीद हुए थे। हालांकि उस दौरान उनकी उम्र 65 साल थी, मगर अपनी बहादुरी से उन्होंने गोरों के छक्के छुड़ाए और भारतीय इतिहास में अमिट छाप छोड़ गए। उनका राज्य स्तरीय 170वां शहीदी दिवस बुधवार को नारायणगढ़ चौक स्थित उनके बुत स्थली तथा गांव अटारी में समाधि स्थल पर मनाया जाएगा।
जरनैल शाम सिंह का जन्म महाराजा रणजीत सिंह के सलाहकार निहाल सिंह के घर अटारी में 1785 में हुआ था। बड़े होने पर वह महाराजा की फौज में भर्ती हुए। 1818 से लेकर 1838 तक उन्होंने मुल्तान, पेशावर, कश्मीर, संगड़, बन्नू तथा हजारे की जंगों में हिस्सा लिया और सिख साम्राज्य का परचम बुलंद किया। सभरावां की जंग उनके जीवन की बड़ी और आखिरी जंग रही।
महाराजा रणजीत सिंह का 1839 में निधन हो गया और जरनैल रिटायर हो चुके थे। सिख फौज की 1845 को अली वाल, मुदकी और फिरोजशाह में हार के बाद बर्तानवी फौज सिखों की राजधानी लाहौर पर कब्जे का मंसूबा बना रही थी। लाहौर दरबार की बागडोर महारानी जिंदा संभाल रही थीं।
महारानी ने जरनैल शाम सिंह को संदेश भेज स्थिति से अवगत कराया और अंग्रेजों द्वारा थोपी जाने वाली जंग का मुकाबला करने की बात कही। उन्होंने 65 साल की उम्र में फिर कमान संभाली और अंग्रेजों के खिलाफ सभरावां की लड़ाई में कूद गए। हालांकि इस दौरान उनकी सेना ने अंग्रेजों को नाकों चने चबा दिए, मगर अपने ही लोगों ने गद्दारी कर दी। इस जंग में 10 फरवरी को वह शहीद हो गए।