अमृतसर. वैसे तो भाषा अभिव्यक्ति का साधन है, मगर उर्दू और संस्कृत दो भाषाएं ऐसी रही हैं, जिन पर मजहब का ठप्पा लग गया। उर्दू मुसलमानों की और संस्कृत हिंदुओं खास करके ब्राह्मणों की भाषा होकर रह गई। लेकिन अहमदिया मुसलमान जमात अपने लोगों को संस्कृत पढ़ा इस मिथक को तोड़ रही है।
अपने करीब सवा सौ साल के वजूद के दौर में इस जमात ने सारी दुनिया को शांति, अहिंसा और भाईचारे का संदेश देने के साथ-साथ एक दूसरे के धर्म का आदर भी सिखाया है। इसी कड़ी के तहत भाषाओं के बीच खड़ी दीवार को भी गिराने में कारगर भूमिका निभाई है। जमात के नुमाइंदे तथा शेख मुजाहिद अहमद अपने नाम के आगे शास्त्री लगाते हैं। कारण पूछने पर पता चला कि उन्होंने बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी से संस्कृत में शास्त्री की हुई है। अरबी भाषा में आनर्स कर चुके शास्त्री ने बताया कि जमात के संस्थापक हजरत मिर्जा गुलाम अहमद साहिब ने मुस्लिम धर्म में आ गई बुराइयों को खत्म करने और इस्लाम के असल मकसद को प्रचारित करने के लिए 1889 में जमात की स्थापना की थी।
उन्होंने स्पष्ट संदेश दिया था कि हरेक धर्म की मूल किताबों को पढ़ा जाए और उनकी खूबियों को अडाप्ट किया जाए। गीता, रामायण, गुरबाणी , बाइबल, कुरान शरीफ के मर्मज्ञ शास्त्री ने बताया कि कादियां में उनकी जमात के लोगों में से कमरुल हक शास्त्री, नसीरूल हक आचार्य ने भी संस्कृत की पढ़ाई की और वेदों तथा पुराणों का अध्ययन और अध्यापन कर रहे हैं।
संस्कृत भाषा की पढ़ाई करने वाले पत्रकार मकबूल अहमद कादियान ने बताया कि उन लोगों से पहले सन 1900 के दौर में हुए मौलाना अब्दुल हक विद्यार्थी ने तो विद्या अलंकार की डिग्री बीएचयू से ली थी। उसी दौर में हुए महाशय फजल हुसैन ने भी बनारस यूनिवर्सिटी से संस्कृत की पढ़ाई करके हिंदुओं के धर्म ग्रंथों को समझा और उनकी अच्छाइयां लोगों तक पहुंचाया। इसी जमात से संबंध रखने वाले तारिक अहमद खान बताते हैं कि नई पीढ़ी में भी कादियां के करीब आधा दर्जन बच्चे संस्कृत की पढ़ाई कर रहे हैं।