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प्रॉफिट की चाहत से खतरे में पड़ा परंपरागत बासमती का वजूद

7 वर्ष पहले
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अमृतसर. वो वक्त दूर नहीं जब अपनी महक और स्वाद के लिए जानी जाती परंपरागत बासमती का सिर्फ नाम ही बाकी रह जाएगा। ज्यादा से ज्यादा लाभ अर्जित करने की चाहत ने चावलों की इस बेशकीमती किस्म का वजूद खतरे में डाल दिया है।

मिसाल के तौर पर अमृतसर के सरहदी गांव वनियेके के किसान गज्जन सिंह कभी अपनी सारी जमीन में बासमती ही उगाया करते थे, लेकिन इस बार उन्होंने अपनी 28 एकड़ जमीन में से साढ़े 27 एकड़ में हाईब्रिड धान की पूसा-1121 किस्म की बिजाई की है, जबकि अपने परिवार के इस्तेमाल के लिए आधे से भी कम एकड़ में बासमती की खेती की है। गज्जन सिंह कहते हैं कि बासमती के कारोबार में अब मुनाफा नहीं रह गया। एक एकड़ में बासमती का झाड़ मुश्किल से आठ क्विंटल भी नहीं मिलता, जबकि 1121 का झाड़ 18 क्विंटल तक मिल जाता है। बासमती चावल को तैयार होने में भी 1121 के मुकाबले ज्यादा समय लगता है।

परंपरागत बासमती के लिए दूर-दूर तक मशहूर ख्याला, कोहाली, बराड़, चौगावां और चैनपुर आदि गांवों के किसान पिछले कुछ सालों से शरबती, सुगंधा, पूसा-1121 जैसी धान की नई किस्मों की बिजाई कर रहे हैं। हालांकि क्वालिटी के मामले में यह चावल परंपरागत बासमती के आगे कहीं नहीं टिकते। गांव ख्याला के किसान ज्ञान सिंह का कहना है कि दरिया रावी के साथ-साथ बसे इलाकों में उच्चकोटि की बासमती होती थी, मगर मुश्किल यह है कि मेहनत और लागत के मुकाबले बाजार में इसका वाजिब मोल नहीं मिलता। गांव कोहाली के किसान शमशेर सिंह ने बताया कि लगभग आठ साल पहले उन्होंने केवल दो एकड़ जमीन में पूसा-44 की बिजाई की थी, लेकिन अब अपनी सारी की सारी 21 एकड़ जमीन में 1121 कि बिजाई कर रहे हैं।
पंजाब राइस मिलर्स एक्सपोर्ट एसोसिएशन के एग्जिक्यूटिव डायरेक्टर अशोक सेठी कहते हैं कि रावी बेल्ट की मिट्टी और यहां का मौसम परंपरागत बासमती की खेती के लिए बहुत अधिक उपयुक्त है। जो खुश्बू और मिठास बासमती में है, वह और किसी किस्म में नहीं।
कमाल पाकिस्तानी बीज का
बासमती के निर्यात से दशकों से जुड़े चमन लाल सेतिया बताते हैं कि 1965 की जंग में भारतीय सेनाएं लाहौर के करीब पहुंच गई थीं। सीजफायर के दौरान भारतीय किसान पाकिस्तानी इलाका देखने निकले तो वापसी पर बासमती का बीज उठा लाए। जब इन बीजों से अमृतसर और गुरदासपुर के रावी किनारे बसे गांवों में खेती की गई तो उम्मीद से ज्यादा नतीजे मिले। इसके बाद अमरीका, कैनेडा, इंग्लैंड और अरब देशों में बासमती का निर्यात 1980-81 में शुरू हुआ। अपनी खासियत के बल पर जल्द ही इस चावल ने विदेशों में भी पहना बना ली।
सरहदी गांव वनियेके के किसान गज्जन सिंह कभी अपनी सारी जमीन में बासमती ही उगाया करते थे, पर अब वह ऐसा नहीं करते।