अमृतसर. लोग डूबते हैं तो समुद्र को दोष देते हैं,मंजिल ना मिले तो किस्मत को दोष देते हैं,लोग खुद तो संभल कर चलते नहीं,ठोकर लगने पर पत्थर को दोष देते हैं।77 वर्ष की उम्र में भी मजीठा रोड के रहने वाले सुदर्शन कुमार अग्रवाल की कलम की स्याही इस उम्र में भी फीकी नहीं पड़ी। पहली नजर में देखने पर उनके चेहरे पर तनाव नाम की कोई चीज नजर नहीं आती। चुस्त और फिट शरीर के मालिक अग्रवाल के चेहरे पर सजे नजर के चश्मे के पीछे की मुस्कराहट उनके सादा व्यक्तित्व को बयान करती है। स्वस्थ और निरोग शरीर का श्रेय वह युवावस्था में किए गए कठिन परिश्रम, नियमित दिनचर्या, शुद्ध वैष्णो भोजन और बे-ऐब जिंदगी को देते हैं।
नौकरी के दौरान की सीए की पढ़ाई
गोल्डन टैंपल के पास शहर के गढ़ कहे जाने वाले चौक लक्ष्मणसर की गली शान में 1937 को जन्मे अग्रवाल एक मिडिल क्लास फैमिली से संबंध रखते थे। पिता लाला विलायती राम की छोटी सी कपड़े की दुकान थी, जिससे परिवार का खर्च चलता था। शुरू से ही जिम्मेदारी को समझने वाले सुदर्शन अग्रवाल को जमाने की ठोकरों ने उम्र से पहले ही समझदार बना दिया। यही कारण था कि घर के आर्थिक हालातों को देखते हुए उन्होंने जी-तोड़ मेहनत की। स्ट्रीट लाइट की रोशनी में मेरिट में एफए पास करने के बाद एक विदेशी बैंक में नौकरी कर ली। नौकरी के दौरान ही प्रभाकर, बीए और सीए पास की। 32 वर्ष की आयु में पिता के देहांत के बाद परिवार का सारा बोझ सुदर्शन पर आ पड़ा, लेकिन उन्होंने परिवार की जिम्मेदारियों को निभाने के साथ-साथ धार्मिक और सामाजिक कार्यों में भी बराबर समय दिया। अग्रवाल पिछले 34 साल से हर साल का कैलेंडर बनाकर बांटते हैं। पीले रंग में बना यह कैलेंडर पीले कैलेंडर के नाम से मशहूर है।
कैलेंडर की एक साइड पर साल के सभी त्योहार और शुभ कार्यों के दिन महीने लिखे हुए हैं, जबकि इसकी पिछली साइड पर हास्य व्यंग्य, सेहत संबंधी देसी नुस्खे, समाज से ताल्लुक रखने वाली बातें और शिक्षाप्रद संग्रह छापा गया है। हर साल हजारों की गिनती में छापे जाने वाले यह कैलेंडर मुफ्त बांटे जाते हैं। इन कैलेंडर पर 10 हजार रुपए खर्च आता है, जो वह अपनी पेंशन से देते हैं। इसके अलावा वह श्री गौरी चालीसा के तीन संस्करण भी मुफ्त बांट चुके हैं। पूछने पर वह कहते हैं कि ईश्वर मुझे शक्ति देता है और मैं इस संसार में अपनी ड्यूटी निभा रहा हूं।