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डाउनलोड करेंअमृतसर. मझोला कद, सफेद दाढ़ी और उसी से मैच करती सफेद पगड़ी, रोजमर्रा की जिंदगी से लेकर बातचीत तक में सामाजिक सरोकारों और मानवीय जीवन मूल्यों के अंश। जी हां, यह वही जगदीश सचदेवा हैं, जिनको आप सभी नाटककार के रूप में जानते हैं। सारी उम्र नाटकों को समर्पित करने वाले सचदेवा 55 साल की उम्र में अब बड़े पर्दे पर इस विधा की दूसरी पारी खेलने को उतर गए हैं।
फिल्मी पारी: जिस फिल्म में वह किरदार निभा रहे हैं उसका नाम है '47 टू 84 इक पीड़'। यह फिल्म 1947 में हुए बंटवारे के दर्द और 1984 में पंजाब में हुए आतंकवाद पर आधारित है। इस फिल्म में उन्होंने पुलिस सुपरिंटेंडेंट का किरदार निभाया है, जिसमें उनकी भूमिका कापटी स्टीक रही है। वह कहते हैं कि वह कला के इस क्षेत्र में उतरते ही अभिनय करने के उद्देश्य थे, मगर नाटककार बन गए। अब उम्र के आखिरी पड़ाव पर उसका मौका मिला है। सचदेवा बचपन से ही कला को समर्पित रहे हैं। आज से 33 साल पहले उन्होंने थिएटर की तरफ रुख किया। कई उतार-चढ़ाव देखे लेकिन निरंतर बढ़ते रहे। बड़ी ही साफगोई से वह कहते हैं कि वह इस क्षेत्र में रोजी-रोटी की तलाश में आए थे और इसी के होकर रह गए। दर्शकों नेभी उन्हें काफी पसंद किया है।
सावी ने रचा इतिहास
गुज्जर समुदाय की महिला पर आधारित नाटक सावी में रूढि़वादी परंपराओं में फंसी एक औरत को बच्चे के साथ शादी करने, उसे पालने और फिर बेटे के रूप में स्वीकारने को बड़े ही जीवंत रूप में पेश किया। वह कहते हैं कि उनके नाटकों के किरदार वे लोग होते हैं, जो हमारे आसपास हैं और समाज उनको अच्छे नजरिए से नहीं देखता। उन्हीं को वह मसलों और मुद्दों का सूत्रधार, कथाकार और पैरोकार बनाते हैं। बकौल प्रसिद्ध नाटककार आत्मजीत-'मान्यता है कि पंजाबी लोकधारा गांवों में बसती है, मगर जगदीश ने शहरी लोकधारा की तलाश करके उन्हें जमीन दी है।
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