अमृतसर. तीन मतवाले फांसी के तख्ते को चूमने जा रहे थे और हर्षित मन से गा रहे थे-
मेरा रंग दे बसंती चोला, माए रंग दे
मेरा रंग दे; मेरा रंग दे बसंती चोला। माए रंग दे बसंती चोला।।
उनकी कुर्बानी की बानगी आज भी आवाम के जहन में ताजा है। पर आपको मालूम है कि आखिर किस क्रूरता के साथ भारत के इन वीर सपूतों को ब्रिटिश हुकूमत ने अपने अस्तित्व के लिए ख़तरनाक मानते हुए फांसी के फंदे पर लटका दिया था।
28 सितंबर, 1907 की गर्म दुपहरी। गांव बंगा, जिला लायलपुर, पंजाब (अब पाकिस्तान में) में एक बच्चे का जन्म हुआ। परिवार में खुशी की लहर दौड़ पड़ी। उस वक्त भला कैसे किसी को यह अंदाज हो सकता था कि आगे चलकर यही साधारण-सा बालक कुछ ऐसा काम कर जाएगा, जिसकी आने वाली नस्लें न केवल कसमें खाएंगीं, बल्कि नजीर भी देंगी।
भगत सिंह ने महज 23 साल की उम्र में देशभक्ति की अमर मिसाल कायम कर सुखदेव थापर और राजगुरु के साथ मौत को गले लगा लिया था, मगर उन्हें एक नहीं, कई मौतों के कुचक्र से गुजरना पड़ा था। जानिए, इन अमर शहीदों की शहादत का पूरा सच इस स्टोरी के जरिए।
आगे की स्लाइड्स में जानिए अंग्रेजी हुकूमत के इस काले अध्याय का पूरा सच, भगत सिंह के बारे में कुछ अनछुए पहलुओं को तस्वीरों के झरोखे से...
नोट : 26 जनवरी गणतंत्र दिवस के अवसर पर dainikbhaskar.com आपको देश के वीर शहीदों के बारे में बता रहा है। अपनी विशेष श्रृंखला 'वीर शहीद' के माध्यम से। इसकी कड़ी में आज पढ़िए भगत सिंह के अंतिम दिनों से जुड़े दिल छू लेने वाले कुछ सच...