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सरदार सिंह ने गरीबों के लिए स्कूल खोला, नौकरी भी छोड़ दी

6 वर्ष पहले
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(अमृतसर. स्कूल के बच्चों के साथ मास्टर सरदार सिंह।)
अमृतसर। सरदार सिंह 20 साल पहले एफसीआई में नौकरी करते थे। छुट्टी के वक्त वह शरीफपुरा इलाके के करीब से गुजरती रेलवे लाइन से होकर घर जाते थे। तब उन्हें वहां अक्सर छोटे-छोटे बच्चे कागज इकट्ठा करते दिखाई देते थे। मासूब बच्चों को कूड़ा बीनते देखकर सरदार सिंह के मन में इनके लिए कुछ करने की मंशा पैदा होती थी। यहीं सोचकर एक दिन सरदार सिंह इन बच्चों के घर पहुंच गए। और इन बच्चों के मां-बाप से इन्हें पढ़ाने की गुजारिश की।
लेकिन, कमाई का जरिया बन चुके इन बच्चों के माता-पिता को समझा पाना आसान नहीं था। बावजूद इसके मास्टर ने हिम्मत नहीं हारी। धीरे-धीरे कुछ बच्चों को इकट्ठा करके पढ़ाना शुरू कर दिया। सरदार सिंह ने सिविल सर्जन आॅफिस के बाहर 18 गुणा 36 के कमरे में सात बच्चों से स्कूल की शुरुआत की। स्कूल का नाम रखा ‘निष्काम सेवा पब्लिक स्कूल’। बस यहीं से सरदार का सपना परवान चढ़ने लगा।

जैसे-जैसे समय बीतता गया बच्चों की गिनती बढ़ने लगी।तब बच्चों को पढ़ाने के लिए टीचरों का इंतजाम करना पड़ा। सरदार सिंह ने अपनी जेब से पैसे देकर टीचरों को हायर किया। बच्चों की पढ़ाई किसी तरह प्रभावित न हो लिहाजा उन्होंने 2004 में नौकरी भी छोड़ दी। और पूरी तरह अपने मिशन को कामयाब बनाने में जुट गए। मास्टर की निष्ठा को देखते हुए तत्कालीन डिप्टी कमिश्नर काहन सिंह पन्नू ने सिविल सर्जन आॅफिस के ठीक सामने बनी सीएमओ आॅफिस की जगह का एक हिस्सा स्कूल को दे दिया। मौजूदा समय में नर्सरी से 10वीं तक चलने वाले इस स्कूल में 201 स्टूडेंट्स हैं। और इन्हें पढ़ाने के लिए 11 टीचरों का स्टाफ है। बच्चों को सुबह के समय रिफ्रेशमेंट के तौर पर बिस्कुट और सर्दियों में मूंगफली, जबकि दोपहर को मुफ्त खाना भी दिया जाता है।
...और रंग ला रही मेहनत, बच्चों को मिलने लगा मुकाम
मास्टर सरदार सिंह बताते हैं कि उनके स्कूल के तीन बच्चे इस समय होटल मेनेजमेंट की डिग्री ले रहे हैं। जबकि कुछ बच्चे बीए, बीकाॅम की पढ़ाई कर रहे हैं। जिनसे प्रेरित होकर स्कूल में बच्चों की संख्या मंे दिनोंदिन इजाफा हो रहा है।
बकौल सरदार सिंह वह इन बच्चों को देश का अच्छा नागरिक बनाना चाहते हैं। यही कारण है कि उन्होंने स्कूल के बोर्ड पर इसके नाम के साथ-साथ भारतीय प्रजातंत्र को समर्पित शब्द भी लिखे हुए हैं। ये शब्द मास्टर जी की देशभक्ति की भावना को दर्शाता है। यही वजह है कि मास्टर जी के नेतृत्व में सात स्टूडेंट्स से शुरू हुआ गया ‘निष्काम सेवा स्कूल’ 200 से अधिक स्टूडेंट्स के साथ अपने मकसद की ओर बढ़ रहा है।