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शुद्ध विचार और सेवा भाव से किए कार्य का मिलता है सार्थक फल

7 वर्ष पहले
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पावरहाऊस रोड के गली नंबर-4 के शिव मंदिर में संतमत सत्संग समिति की ओर से आयोजित श्रीमद् भागवत कथा सप्ताह ज्ञान यज्ञ के चौथे दिन वीरवार को कथाचार्य व्यासानंद जी महाराज ने देवर्षि नारद द्वारा धर्मराज युधिष्ठिर को दिए उपदेश का प्रसंग सुनाया।

उन्होंने श्रद्धालुओं को कथा सुनाते हुए बताया कि मनुष्य के लिए धर्म के प्रमुख लक्षण इस प्रकार हैं- सत्य, दया, तप, तितिक्षा, उचित-अनुचित का विचार, मन का संयम, इंद्रियों का संयम, अहिंसा, ब्रह्मचर्य, त्याग, स्वाध्याय, सरल व्यवहार, संतोष, साधु सेवा, भोग से निवृत्त, अभिमान त्यागकर कार्य करना, मौन अर्थात वाणी का संयम, आत्मचिंतन, यथायोग्य दान देकर प्राणियों को संतुष्ट करने की प्रवृत्ति, सब में इष्ट का निवास जानकर राग-द्वेष नहीं करना तथा परमात्म कथा का प्रेमपूर्वक श्रवण करना है।

उन्होंने कहा कि ब्राह्मणों में शम, दम, तप, संतोष, क्षमा, सत्य, भागवत चिंतन, धीरता, त्याग आदि गुण होते हैं। क्षत्रिय में देवता की आराधना, अर्थ, धर्म, मोक्ष, उदारता, राष्ट्र की सेवा तथा रक्षा आदि गुण विद्यमान होते हैं। वैश्य में धनोपार्जन, व्यापार, साधु सेवा, ईश्वर भक्ति, कृषि कार्य आदि गुण मौजूद होते हैं। शूद्र में शुद्ध भाव से सेवा की भावना होती है।

उन्होंने कहा कि निकृष्ट से निकृष्ट प्रकार के कार्य को भी शूद्र भागवत सेवा समझकर सहर्ष करने को तत्पर रहते हैं। उन्होंने कहा कि वास्तव में शुद्ध और पवित्र आत्मा ही शूद्र कहलाता है। इससे पहले कथा का प्रारंभ वेद ध्वनि से हुआ। इस दौरान आध्यात्मिक भजन सुनकर श्रद्धालु आनंदित हुए। अंत में भगवान की आरती कर कथा का समापन हुआ।

शिव मंदिर में प्रवचन देते हुए स्वामी व्यासानंद जी महाराज।