बड़े घरानों को 1.14 लाख करोड़ की माफी जनता से धक्का : कुसला
भारतके 29 बैंकों द्वारा वर्ष 2013 से 2015 के मध्य दो वर्षों में 1.14 लाख करोड़ रुपए माफ करना सीधे तौर पर कर्जा माफी के नाम पर लूट है तथा आम लोगों के साथ धक्का है। सिदक मेमोरियल राइट्स अवेयरनेस एंड इरेडिकेशन आफ सोशल इवल्स फोरम ने यह सवाल जनता दरबार में उठाया है। शनिवार को हुई बैठक में कर्जा माफी के नाम पर हो रही लूट को गंभीरता से विचार-विमर्श किया गया।
प्रधान साधुराम कुसला ने कहा कि बड़े घराने के कर्जे माफ करने का रुझान 2004 से तेजी से बढ़ा है। ज्यों-ज्यों बड़े घरानों को राजनीतिज्ञों की छत्रछाया मिल रही है, बेड डेबिट के कर्ज माफ करने का सिलसिला बढ़ने लगा है। उन्होंने कहा कि ग्रामीण तथा शहरी क्षेत्र में कुछ लाख रुपए के कर्जदारों के घरों के आगे बैंक अधिकारी रिकवरी के लिए शोर मचाते हैं तथा मोहल्ले/गांव में कर्जदारों को जलील करते हैं। कई बार कर्जदार की गहने रखी जमीन जायदाद की नीलामी के बड़े-बड़े पोस्टर छपवाए जाते हैं परंतु कुछ बड़े घरानों का 1.14 लाख करोड़ रुपए आसानी से ही यह कहकर माफ कर दिया जाता है कि यह बेड डेबिट था।
उन्होंने कहा कि 1.14 लाख करोड़ रुपए का कर्जा माफ करने की बजाय किसानों के सिर खड़ा कर्ज माफ किया जाता तो आत्महत्याओं की जिल्लत से किसानों को मुक्त किया जा सकता था तथा कई घरों उजड़ने से बच सकते थे। कुसला ने कहा कि पहले बैंकों का ऑडिट करने के लिए तीन मेंबरी कमेटी ऑडिटर नियुक्त करती थी परंतु 2004 से यह अधिकार बैंकों के चेयरमैनों को दिए गए हैं जिससे बैंकों में हो रही अनियमितता बाहर नहीं आती।