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रावी और ब्यास में पानी कम हो चुका बंटवारे के लिए ट्रिब्यूनल बने: पंजाब

6 वर्ष पहले
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पड़ोसीराज्यों के साथ नदियों के पानी के बंटवारे को लेकर पंजाब सरकार ने फिर से सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर ट्रिब्यूनल बनाने की मांग की है। यह केस संविधान की धारा 131 के तहत दायर किया गया है। पंजाब ने अपील में यह भी निर्णय करने की मांग रखी है कि क्या हरियाणा और राजस्थान रापेरियन राज्य हैं या नहीं।

पंजाब पहले भी केंद्र को कह चुका है कि रावी -ब्यास नदियों के पानी में कमी चुकी है। ऐसे में पानी का बंटवारा फिर से करने के लिए ट्रिब्यूनल का गठन किया जाए। 1981 -2002 तक के पानी बहाव के आंकड़ों अनुसार रावी-ब्यास नदियों में पानी की उपलब्धता 17.17 एमएएफ से घटकर 14.37 एमएएफ रह गई थी और अब यह और कम होकर 2013 तक 13.38 ही रह गई है। पंजाब में भू-जल भी चिंतनीय स्तर तक गिर चुका है। यही नहीं, 12 मई 1994 में उत्तरप्रदेश, हरियाणा, दिल्ली, राजस्थान और हिमाचल प्रदेश के बीच हुए यमुना समझौते के अनुसार यमुना बेसिन क्षेत्रों को 4.65 एमएएफ पानी दिए जाने के कारण पानी की उपलब्धता और भी घटी है। अपील में नया तर्क यह है कि केंद्र भू-जल बोर्ड के सर्वेक्षण अनुसार राज्य में सिंचाई के लिए नदी जल की कमी के कारण 138 ब्लॉकों में से 110 ब्लॉकों में भू-जल की सीमा से अधिक प्रयोग करना पड़ा है।

पंजाब साजिश कर रहा, हम भी सुप्रीम कोर्ट जाएंगे : हरियाणा पंजाबसरकार के सुप्रीम कोर्ट जाने को हरियाणा सरकार ने साजिश बताया है। सरकारी प्रवक्ता ने कहा, इस संबंध में हरियाणा के हक में आए फैसले को पंजाब लटकाना चाहता है। त्रि-पक्षीय जल समझौते-1974 को एकतरफा समाप्त करने के पंजाब के निर्णय को हरियाणा सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देगा। वैसे भी अन्तरराज्यीय नदियों के पानी से संबंधित समझौतों को एकतरफा खत्म करना कानूनन ठीक नहीं है।

राज्य सरकार ने अपील में कहा है कि नदी जल विवाद कानून के तहत किसी भी राज्य द्वारा शिकायत मिलने के एक साल के अंदर ट्रिब्यूनल बनाने का नियम है, लेकिन पंजाब पिछले दस सालों से यह मांग कर रहा है। इतना लंबा समय बीतने के बावजूद कोई कार्रवाई नहीं हुई। पंजाब लंबे समय से इस संबंधी लिखित तौर पर केंद्र के पास यह मसला उठाता रहा है और सीएम खुद समय समय पर यह मुद्दा केंद्र सरकार के पास उठाते रहे हैं। ऐसे में पंजाब सरकार के पास पानी के पुन: वितरण करवाने के लिए ट्रिब्यूनल का गठन करवाने के लिए सुप्रीम कोर्ट में जाने के अलावा और कोई चारा नहीं रहा।

सरकार ने दावा किया है कि रावी ब्यास के पानी पर पहला हक पंजाब का बनता है जहां पहले ही पानी की कमी है। हरियाणा के यमुना बेसिन क्षेत्र में 12 मई, 1994 को यमुना समझौता करके और शारदा यमुना लिंक चैनल का प्रोजेक्ट बनाकर रावी, ब्यास के पानी से अपना अधिकार पूरी तरह से गंवा लिया है। ब्यास नदी के पानी को यदि यमुना बेसिन क्षेत्र को सप्लाई किया जाता है तो इससे पहले ही पानी की कमी से जूझ रहे पंजाब के फिरोजपुर, फरीदकोट, मुक्तसर साहिब, मोगा, संगरूर, मानसा और बठिंडा जिलों में पानी का सूखा और बढ़ जाएगा। इन क्षेत्रों को राज्यों के पुनर्गठन से पहले कानूनी तौर पर पानी का वितरण किया गया था। पिछले पांच दशकों से ये क्षेत्र राइपेरियन सिद्धांत के अनुसार पानी का इस्तेमाल करते रहे हैं। इस क्षेत्र को नदी जल पर आधारित नहरी पानी की सप्लाई इसलिए भी जरूरी है क्योंकि भू-जल भी खारा है और यहां पानी खेती सिंचाई के लिए इस्तेमाल योग्य नहीं है।