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फेदर के रेट पहुंचे 475 रुपए प्रति किलो, शटल कॉक के कारखानों में प्रोडक्शन घटा

7 वर्ष पहले
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बैडमिंटनखिलाड़ियों के लिए शटल कॉक बनाने वाले कारखानों में सस्ती और मीडियम रेंज की शटल की मैन्युफैक्चरिंग तेजी से कम हो गई है। जिससे इंडस्ट्री का टोटल पचास फीसदी प्रोडक्शन गिर गया है। इसकी वजह फेदर रेट पहली बार बढ़कर 475 रुपए तक पहुंचना है। इंडस्ट्री डिपार्टमेंट के सामने मसला उठाने की तैयारी है। शटल कॉक में तीन चीजें होती हैं। सबसे महत्वपूर्ण है फेदर। मुर्गी के पंख काटकर शटल कॉक में लगते हैं। फिर इन्हें जोड़ने के लिए गोंद और धागे का इस्तेमाल होता है। तीसरी चीज है इसके हैड में लगने वाला फोम चढ़ा लकड़ी का कॉक। फेदर को लोग बरवाड़ा, राजस्थान, हरियाणा और यूपी से मंगवाते हैं।

मजबूरीमें सस्ती शटल की प्रोडक्शन घटा रहे

अपनीपचास साल पुराना खेल सामान मैन्युफैक्चरिंग यूनिट चला रहे जौली बेदी ने बताया कि दस-बारह रुपए में शटल बच्चों को मिलेगी तो वह इसे खरीद सकेंगे। इतने की शटल तो फेदर महंगा होने पर घर में पड़ रही है। उन्होंने मांग की है कि सरकार कच्चे माल के रेट कंट्रोल करने के लिए कदम उठाए। बैडमिंटन के खेल में प्लास्टिक के बने चाईनीज शटल का इस्तेमाल बढ़ेगा, इससे लोकल कारोबार खत्म हो रहा है।

मेरठ में ज्यादा खपत होने लगा है फेदर

^शटल कॉक मैन्युफैक्चरिंग इंडस्ट्री से जुड़े करीब 50 से ज्यादा व्यापारियों के लिए फेदर का इंतजाम करना बहुत महंगा और टेढ़ा खेल बन गया है। वजह ये है कि जालंधर में खेल इंडस्ट्री संकट में है। जबकि मेरठ में यही इंडस्ट्री तरक्की कर रही है। वहां के व्यापारी ज्यादातर फेदर खरीद ले जाते हैं। करीब होने के कारण फेदर व्यापारी पास की मार्केट में माल सप्लाई करना पसंद करते हैं, जिसकारण यहां माल में कमी हो जाती है, जिससे रेट बढ़ते हैं। मेरठ में लेबर सस्ती है, जिस कारण वहां शटल कॉक का दाम भी कम है। -प्रवीणआनंद, कारोबारी