जालंधर। पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट के एडवोकेट एचसी अरोड़ा की किताब ‘गाथा शहीद मदन लाल ढींगरा’ रविवार को प्रेस क्लब में रिटायर्ड जस्टिस एसएन अग्रवाल ने रिलीज की। एडवोकेट अरोड़ा की पहली किताब थी ‘जंग जारी है’।
मदन लाल ढींगरा देश की स्वतंत्रता के लिए हुई लड़ाई के सबसे पहले शहीद थे। वे साल 1906 में लंदन की यूनिवर्सिटी कालेज में मैकेनिकल इंजीनियरिंग करने गए थे। वहीं पर रहकर वे वीर सावरकर जैसे देशभक्तों के संपर्क में आए। साल 1909 में इंडियन नेशनल एसोसिएशन के एनुअल फंक्शन पर उन्होंने सर विलियम हट कर्जन वायले के मुंह पर चार गोलियां चलाई थीं, जिसके कारण उनको फांसी की सजा सुनाई गई। अगस्त 1909 में उन्हें फांसी दे दी गई। तब वह 26 साल के थे। गदर लहर तो इसके बाद शुरू हुई जिसमें 1915 में कई क्रांतिकारियों ने अपनी शहीदी दी। शहीद भगत सिंह मदन लाल से खूब इंस्पायर थे। उन्होंने कई अखबारों में आर्टिकल लिखे जोकि मदन मोहन लाल की शहीदी के बारे में थे। उनका पहला आर्टिकल था - फर्स्ट राइवल मारटियर ऑफ पंजाब।
प्रेस क्लब में बुक रिलीज के मौके पर देश भगत यादगार हॉल कमेटी की महासचिव रघबीर कौर, गुरमीत सिंह, सतनाम सिंह माणक, समाजसेवक करणवीर शंटी, प्यारा सिंह भोगल और दीपक बाली मौजूद थे।
बुक में अरोड़ा ने लिखीं 9 कविताएं
चंडीगढ़के रहने वाले एचसी अरोड़ा लिखते हैं - सभ तो पहला विद्रोही ते सभ तो पहला शहीद, करदा हां मैं सलाम उसनूं मैं उसदा मुरीद...। उनकी बुक में 9 कविताएं हैं, जिनमें मदन लाल ढींगरा का वायले का कत्ल करना, कोर्ट में इकबालिया बयान, भगत सिंह का उन्हें पहला शहीद करार देना आदि बयां किया गया है। उन्होंने शहीद के अमृतसर में टूटे पड़े घर का नवनिर्माण करने और वहां पर उनका स्मारक बनाने के लिए जो याचिका दायर की और स्मारक बनाने का पंजाब सरकार का जो उत्तर था वह भी शामिल किया है।
जेलमें भाई से भी नहीं मिले थे ढींगरा
चंडीगढ़के रहने वाले जस्टिस एसएन अग्रवाल ने कहा कि मदन लाल ढींगरा जब जेल में थे तो उनसे उनके भाई मिलने पहुंचे लेकिन उन्होंने अपने भाई से मिलने को मना कर दिया। लेकिन वह वीर सावरकर से जरूर मिले क्योंकि वह जानते थे कि उनके परिवार वाले ब्रिटिश बोली ही बोलेंगे। जब उनको फांसी देने से पहले दो ख्वाहिशें पूछी गईं तो उन्होंने कहा - एक तो उनका संस्कार हिंदू धर्म के मुताबिक किया जाए। दूसरा जो भी उनका समान है उसे बेचकर पैसा देश के काम में लगाया जाए।