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लोग नशा छोड़ें; एक लाख किमी. बिना सीट की साइकिल चलाई

6 वर्ष पहले
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ankit.sharma@dbcorp.in

58साल के साइक्लिस्ट हीरा लाल यादव। मकसद है तो बस नो स्मोकिंग नो ड्रिंकिंग के लिए जागरूक करना...। अठारह साल से बिना सीट वाली साइकिल पर देश भर की यात्रा कर रहे हैं। नशा छोड़ पाना मुश्किल है, ऐसा कहने वालों में चेतना जगाने के लिए ही बिना सीट वाली साइकिल पर यात्रा करने जैसा मुश्किल काम चुना। दूसरों में नशा करने का जज्बा जगाने वाले यादव में ऐसी सोच 1997 में बेटे को देख आई। जब साढ़े तीन साल की उम्र में बेटा प्रदीप सिगरेट और बीड़ी को टुकड़े इकट्ठे कर जेब में रखने लग पड़ा। फिर जलती हुई बीड़ी उठाकर पीने लगा। हीरा लाल खुद भी उस समय स्मोकिंग करते थे। उस घटना को देख तभी स्मोकिंग करने का प्रण लिया और जागरूकता फैलाने का फैसला लिया...। वह अब एक लाख किलोमीटर तक साइकिल चला चुके हैं।

गोरखपुर के रहने वाले हीरालाल के परिवार में छह भाई दो बहनें थीं। कहते हैं - खाना नसीब से ही मिलता और पेटभर तो किसी की शादी भोग पर ही। आम दिनों में चावल कम पानी ज्यादा और हल्दी डाल खाते थे। जमींदारों की भैंसे चराने का काम किया। जैसे-तैसे तंगी के हालात देख 11वीं कक्षा की। शूरवीरों गुरुओं की कार्बन कॉपी करते-करते कला का गुर सीखा। फिर बीए एमएम-1 की। घर के हालात ठीक नहीं थे, तो 1981 में 200 रुपए दोस्त राम नारायण से लेकर मुंबई चले गए। पांच रुपए डेली बेस पर काम, कभी फ्रूट बेचा तो कभी महिलाओं के कपड़े। फिर 1983 में बोरीवाली स्टेशन पर सब्जी बेची। कारोबार बढ़ा रोजाना एक से दो हजार किलो सब्जी बिकनी शुरू हुई। 1990 को नासिक से सब्जी लाने ट्रक में जा रहे थे, रास्ते में किडनी में दर्द हुआ। सर्जरी के लिए एक लाख रुपए का लोन लिया। लंबा टाइम अस्वस्थता की वजह से व्यापार ठप हो गया था। सिर पर कर्जा चढ़ा। पैसे की तंगी ने शराबी स्मोकर बना दिया। कर्ज मांगने आने वाले लोग गालियां देने लग पड़े। चेतना जागी तो शराब छोड़ी। प|ी शकुंतला के चांदी के जेवर बेच कर चाय की रेहड़ी लगाई। काम चल पड़ा तो कुछ महीने बाद टिफिन सर्विस भी शुरू कर सारी उधारी चुकाई। 1997 में 50वें इंडिपेंडेंस डे पर ह्यूमेनिटी और चैरिटी के लिए यात्रा शुरू की। फिर दूसरी यात्रा से बीड़ी सिगरेट छोड़ अपनी साइकिल यात्रा को मकसद मिला।

हीरा लाल यादव

उम्र : 58साल

निवासी: गोरखपुर(गांव सिंघारी)

परिवार: प|ी(शकुंतला), बेटे (जगदीप, प्रदीप)

संकल्प: साइक्लिंगसे नशे के खिलाफ चेतना लाना

साइकिल पर सीट हो और गड्ढा आने पर बैलेंस बिगड़ने की संभावना थी। मुश्किल था, पर जिद भी। क्योंकि जब नशा छोड़ना हो तो चेतना को जगाना भी जरूरी है। तीन महीने प्रैक्टिस की। फिर साइक्लिंग भी ठीक होने लगी। फिर 103 दिनों की मुंबई, चेन्नई, दिल्ली, कोलकाता तक यात्रा की। बुरा भला भी कइयों ने कहा, पर साइकिल को देख चौंके और मकसद को जान जुड़ते भी गए। तभी से वह साइकिल पर तिरंगा, ग्लोब और पौधे रख कर यात्रा पर निकलते हैं।

2012 मेंअरुणाचल प्रदेश, अमृतसर और थाणे सहित अलग-अलग जगहों में सेव गर्ल चाइल्ड, पर्यावरण संरक्षण और समाज चेतना के लिए 199 दिनों की साइकिल यात्रा की।

2005मेंसरबजीत की रिहाई के लिए प्रचार यात्रा की।

2004मेंथाइलैंड, लीओस, वियतनाम और कंबोडिया तक 90 दिनों की यात्रा की।

1999मेंमुंबई से कारगिल तक यात्रा की। 42 दिनों की इस यात्रा में शहीदों के परिवारों से मुलाकात की।