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‘हम संसारी ज्ञान से महानता का शिखर छूना चाह रहे, जो भ्रम है’

7 वर्ष पहले
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दिव्यज्योति जागृति संस्थान में मासिक सत्संग समागम में श्रेया भारती ने कहा कि आध्यात्म का प्रारंभ तो स्वयं की खोज से होता है। यही सदा से समय की पहली मांग भी रही है। भौतिकवाद में डूबा मानव हमेशा से ही संसार को जानना चाहता है। हम स्वयं से अनजान है, हम कौन है कहां से आए हैं, इत्यादि प्रश्नों का हल हमारे पास नहीं है। संसार के ज्ञान से ही हम महानता के शिखर को छूना चाह रहे हैं। जो हमारे जीवन का एक बहुत बड़ा भ्रम है। अध्यात्म हमारे भ्रम को तोड़ता है और हमें सत्य की अनुभूति से सत्य की ओर ले जाता है। यह सत्य कहीं बाहर से नहीं हमारे भीतर है। दिव्य प्रकाश भी हमारे भीतर प्रकट होता है।

स्वामी नरेंद्रानंद ने कहा कि मानव स्वयं तो वास्तव में पवित्र ही है, किंतु विषयों का संग, उस पर दुष्प्रवृत्तियां की परत चढ़ा देता है। हमारे महापुरुषों का कहना है कि यदि मानव स्वयं वास्तव में पवित्र होता तो वह कभी भी अपनी खोई पवित्रता को दोबारा प्राप्त ही कर पाता। ऐसे में कोई भी दुष्टता के बाद अच्छाई की ओर कभी झुक पाता।

सत्संग में कहा बताया गया कि आध्यात्म सदा से समय की पहली मांग रही है।