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गाना डिस्कस करते थाने पहुंच गए थे कामिल और इम्तियाज
यहउन दिनों की बात है जब इरशाद...इरशाद कामिल और इम्तियाज... इम्तियाज अली थे। उनकी और मेरी पहली फिल्म ‘सोचा था’ की एक सिचुएशन पर गाना लिखना था। गाना डिस्कस करने को हम दोनों बरिस्ता कॉफी हाउस के बाहर मिले। पहले मैंने पूछा, कैसे हो? जवाब - ठीक हूं। फिर इम्तियाज ने पूछा, तुम कैसे हो। मैंने कहा ठीक हूं। हर सवाल के बाद 10 सेकेंड का पॉज। छह बार वही सवाल। फिर हम हंस पड़े। दरअसल हम दोनों की जेब में पैसे नहीं थे। बरिस्ता नहीं जा सकते थे सो वर्सोवा बीच चले गए। सात से आठ। आठ से दस और दस से रात के एक कब बज गए पता ही नहीं चला।
होश तब ठिकाने आए जब पुलिसवाला आया। उसने इम्तियाज से पूछा आप कौन तो बोले मैं डायरेक्टर। पूछा फिल्म का नाम बताओ तो बोले बना रहे हैं। मुझसे भी वही सवाल पूछा तो मैंने बोला गाने लिखता हूं। तो पुलिस वाले ने पूछा कि कौन सा गीत लिखा है। मैना कहा - वही लिख रहे हैं। पुलिस दोनों को वर्सोवा थाने ले गई। मैंने वहां भी टाइम पास करने के लिए एक पुलिस वाले को नज्में सुनानी शुरू कर दीं, जब मैं नहीं रुका तो 40 मिनट बाद पुलिस ने हमें फिर देर रात घूमने की चेतावनी देकर छोड़ दिया। खैर... मैं इम्तियाज से कैसे मिला यह भी कहानी है। सीरियल लिखने और स्ट्रगल के 12-13 साल बाद लगा कि मैं सीरियल नहीं लिखना चाहता। म्यूजिक डायरेक्टर संदेश शांडिल्य से मिलने गया। मेरी इक नज्म सुनी और फिर अब तक जो एक बार भी बैठने को कहा था, बोले कुर्सी लो बैठ जाओ। कई नज्में सुनीं। फिर बोले, फोन लगाऊंगा। मुंबई में इस जुमले का मतलब होता है, फिर कभी मत मिलना। मैं भूल गया, लेकिन एक दिन फोन आया, 11 साल पहले की बात है। बोले, एक पतला दुबला सा नया लड़का है इम्तियाज। फिल्म बनाना चाहता है। फोन कर लो। इम्तियाज को फोन किया तो बरसात हो रही थी। इम्तियाज बोला - बारिश रुकेगी तो मिलते हैं। मैंने कहा मुंबई की बारिश है ये हो कि रुकते हुए यह मौका भी छूट जाए। मैं अॉटो में ही पूरा भीगा हुआ इम्तियाज के पास पहुंचा। फिर बातें होने लगी गालिब, साहिर और फैज की। ऐसा लगा कि हम बिछड़े हुए कोई दोस्त हैं। यह हमारी दोस्ती के सफर की शुरुआत थी। फिर सोचा था, जब वी मेट, लव आज कल, रॉकस्टार और हाईवे। हम साथ सफर में हैं।
एचएमवी कॉलेज मेंे प्रोग्राम खत्म होने के बाद लड़कियों ने इरशाद कामिल को करीब आधे घंटे तक घेरे रखा। -बृजेश शर्मा
इम्तियाज अली ने पहली फिल्म बनाई थी “सोचा था’, तब से लेकर अब तक इम्तियाज अली और इरशाद कामिल साथ-साथ हैं। दोनों अपनी फिल्मों के नाम के बजाए अपने नाम से जाने जाते हैंं। यह इन दोनों का हासिल है। लेकिन इस हासिल के पार इरशाद का लिखा जो फिल्मों में नहीं आया वो अपनी किताब ‘एक महीना नज्मों का’ में समेट कर जालंधर के एचएमवी और डीएवी के स्टूडेंट्स से रूबरू हुए। इरशाद कामिल के लफ्जों में