- Hindi News
- मेरे पुत्त ने कदी घुग्गी नहीं मारी, लोकां नूं किद्दां मार सकदा
मेरे पुत्त ने कदी घुग्गी नहीं मारी, लोकां नूं किद्दां मार सकदा
पिता थे गांव के बड़े किसान, सदमे में हो गई मौत
मेरेपुत्तने कदी घुग्गी नहीं मारी, लोकां नूं किद्दां मार सकदा है। ओह तां बचपन तों ही शर्मिला सी। लोकां नूं मिलना वी उसनू पसंद नहीं सी। इसे करके ओहने अठवीं तो बाद स्कूल छड्ड दित्ता। मेरे मुंडे नू फसाउण लई सारा ड्रामा तैयार कीता गया है। इतना कहते-कहते सुरिंदर कौर का गला भर आता है। दस मिनट तक कुछ नहीं बोलतीं। दस मिनट बाद जब धीरे से बोलना शुरू करती हैं तो 15 साल पीछे चली जाती हैं।
कहती हैं, 15 साल से उन्होंने बेटे का मुंह नहीं देखा। सुरिंदर के बेटे बलविंदर पोसी का नाम 2006 में जालंधर बस स्टैंड पर हुए ब्लास्ट के बाद सामने आया था। अब पोसी को अमेरिका से भारत लाने की तैयारियां चल रही हैं। इस वारदात में बलविंदर का नाम आने के बाद सुरिंदर कौर ने अपना एक ही बेटा नहीं खोया। इस घटना के बाद उनके बड़े बेटे अमरजीत सिंह उर्फ पप्पू ने भी जैसे घर से नाता तोड़ लिया हो। 70 साल की सुरिंदर कौर कहती हैं अब तो उन्हें बेटों के चेहरे भी सही से याद नहीं।
पोसी पिंड के बाहर दोआबा बिस्त नहर के पास खड़ी बलविंदर पोसी की कोठी में अब अक्सर सन्नाटा रहता है। आलीशान दिखने वाली इस दो मंजिला कोठी के खिड़की-दरवाजे पिछले आठ साल से लोगों ने खुलते नहीं देखे हैं। कोठी में बलविंदर की मां सुरिंदर कौर अपनी 45 साल की बेटी और करीब 21 साल के नवासे दलजीत सिंह के साथ रहती हैं। सालभर पहले यहां तब चहलपहल हुई थी जब पंजाब पुलिस ने कोठी और आसपास के खेतों से भारी मात्रा में असलहा बरामद किया था।
इस मामले में पोसी की मां-बहन और भांजे को भी गिरफ्तार किया गया था। हालांकि कुछ दिन बाद तीनों को जमानत मिल गई लेकिन इसके बाद सभी कोठी में कैद हो गए।
सुरिंदर कहती हैं उनके छह बच्चों में वह सबसे शर्मीला और मददगार था। 8वीं तक उसने गांव के सरकारी स्कूल पढ़ाई की और इसके बाद करीब 16 साल की उम्र में वह पेपर मिल में नौकरी करने लगा। करीब छह महीने उसने पेपर मिल में नौकरी की और इसके बाद अपनी बुआ के पास ग्रीस चला गया। ग्रीस में मन नहीं लगा तो बलविंदर अपने दोस्तों के पास इंग्लैंड चला गया।
सुरिंदर कहती हैं यहां भी वह बहुत दिन नहीं रहा और कैनेडा रहते गांव के लड़कों के पास चला गया। कुछ साल कैनेडा में नौकरी करने बाद बलविंदर अपने बड़े भाई अमरजीत के पास अमेरिका पहुंचा। अमेरिका में कुछ दिन भाई