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संस्कृति केएमवी में शॉर्ट फिल्में देख बच्चे सीख रहे हैं मोरल वैल्यूज
संस्कृतिकेएमवी की छठी क्लास। टीचर्स और स्टूडेंट्स प्रोजेक्टर पर नजर गड़ाए फिल्म देख रहे हैं। फिल्म में हिस्ट्री की एक टीचर हैं, जो क्लास में प्रोजेक्ट देती हैं। एक स्टूडेंट ‘पावर पॉइंट’ प्रेजेंटेशन बनाकर लाता है। बाकी स्टूडेंट भी देखा देखी कंप्यूटर पर प्रोजेक्ट बनाते हैं। टीचर कंप्यूटर नहीं जानती। स्टूडेंट्स को डांट कर कहती हैं मुझे कॉपी पेस्ट नहीं हाथ से बनी प्रेजेंटेशन चाहिए। लंच टाइम में दूसरे टीचरों से इस बारे बात करती हैं तो टीचर उन्हें कंप्यूटर सीखने की सलाह देते हैं। टीचर मान जाती हैं और एक साइबर कैफे में कंप्यूटर सीखने जाती हैं। देखती हैं कि क्लास में पीपीटी लाने वाला बच्चा वहां पर पार्ट टाइम जॉब करता है ताकि पढ़ सके और घर चला सके। अब वो स्टूडेंट टीचर का स्टूडेंट है। स्टूडेंट टीचर से अपनी आर्थिक हालत क्लास में बताने के लिए कहता है और टीचर उससे कंप्यूटर सीखने के वादे के साथ मान जाती हैं। कुछ दिन बाद टीचर खुद आगे बढ़कर कंप्यूटर सीखती हैं। यह अपने स्किल्स को अपडेट करने का उदाहरण है। दरअसल संस्कृति केएमवी स्कूल में मोरल वेल्यूज पढ़ाने के लिए हर क्लास को इन दिनों फिल्में दिखाई जा रही हैं। यूकेजी से लेकर 10वीं क्लास, उनके पेरेंट्स यहां तक कि टीचर्स को भी मोरल वैल्यूज समझाने और लाइफ स्किल्ज सिखाने के लिए फिल्में हैं। फिल्म से क्या सीखा, उस बारे में लिखा जाता है। बच्चों से ये भी पूछा जाता है कि अगर वह फिल्म के किसी पात्र के रूप में होते तो कैसे फैसला लेते।
प्रिंसिपल रचना मोंगा इसे सेल्फ असेसमेंट कहती हैं। उन्होंने बताया कि मोरल वैल्यूज हो या लाइफ स्किल हम पढ़कर उतना नहीं सीखते, जितना कि देखकर। यह साइकोलॉजी का रूल है कि देखी हुई चीजें हमारे दिमाग पर ज्यादा असर डालती हैं। चार साल पहले मैंने आईआईटी दिल्ली की सालाना कॉन्फरेंस अटैंड की थी।
एक कंपनी ने स्कूल फिल्म्स प्रोजेक्ट’ के बारे में बताया कि कैसे फिल्मों के जरिए बच्चों को हम वो सिखा सकते हैं, जो डांट खाकर या पढ़कर नहीं सीखते। मैंने इसे फॉलो किया और अब मुंबई की कंपनी स्कूल फिल्म्स संस्कृति केएमवी में लागू कर लिया। दरअसल सीबीएसई जिस कॉम्प्रिहेंसिव एंड कंटीन्युअस एजुकेशन सिस्टम की बात कर रहा है, वो यही है। एक्टीविटी बेस्ड एजुकेशन। मेरे पास सभी क्लासेज के लिए उनकी उम्र के हिसाब से सीख देने को फिल्में हैं। सिर्फ बच्चों को ही क्यों सिखाया जाए, टीचर्स और पेरेंट्स के लिए भी फिल्में हैं।