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सिर्फ तुलसी रामायण ही उनके नॉवल से ज्यादा बिकी

7 वर्ष पहले
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प्रमोद कौशल|फिल्लौर (जालंधर)

parmod.kaushal@dbcorp.in

सबसे लोकप्रिय आरती ओम जय जगदीश... लिखने वाले पंडित श्रद्धाराम फिल्लौरी को हिंदी का पहला नॉवलकार का दर्जा दिलाने की मुहिम पंजाब में जोर पकड़ रही है। आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने 1902 में छपे लाला श्रीनिवास के परीक्षा गुरु को पहला उपन्यास माना। मगर गुरु नानक देव यूनिवर्सिटी अमृतसर में हिंदी के प्रोफेसर रहे डा. हरमहेंद्र सिंह बेदी कहते हैं : फिल्लौरी जी इससे भी बीस साल पहले भाग्यवती लिख चुके थे।

तो आचार्य शुक्ल ने इसे क्यों नहीं मान्यता दी? प्रो. बेदी कहते हैं - आधुनिक हिंदी साहित्य के बारे में उनकी सूचनाएं अधूरी थीं। पंजाब के हिंदी साहित्य के बारे में तो और भी कम।

पंजाब के साहित्यकार संगत सवाल उठा रहे हैं - कथाकार गंगाप्रसाद विमल कहते हैं। उनके अनुसार - शुक्ल के लिखे इतिहास को तो उन्हीं के शिष्य आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने खारिज कर दिया था। यह कहकर कि उनके पास जो सामग्री थी, उससे इतिहास नहीं लिखा जा सकता था। विमल के अनुसार : शुक्ल जी बीएचयू के लिए किताब लिख रहे थे। उनका ज्ञान देवरिया, पटना, बस्ती, बनारस के साहित्यकारों तक ज्यादा था।

हिंदी आलोचक डॉ. विनोद शाही भी कहते हैं - पंजाब में भाग्यवती को लोग अपनी बेटियों को शादियों तक में देते थे। इसने पंजाब में हिंदी को बढ़ाया। नई चेतना जगाई। कहते हैं, तब तुलसी रामायण ही इससे ज्यादा बिकती थी। आलोचकों ने इसे उपदेशात्मक कहकर अनदेखा किया। मगर वह तो आरती में भी राष्ट्रीय चेतना जगा रहे थे। उनका सवाल है - भक्तजनों के संकट क्षण में दूर करें... में आखिर वह किस संकट की बात कर रहे थे? 1863 में लिखी गई आरती में यह संकट गुलामी का ही था।

प्रो. बेदी कहते हैं - परीक्षा गुरु तो निबंध है। भाग्यवती आधुनिक उपन्यास के मापदंडों पर खरा उतरता है। इसमें बाल विवाह की निंदा और विधवा विवाह की वकालत की गई है। बनारस के पंडितों ने वहां यह उपन्यास छापा मगर ये प्रसंग गायब कर दिए। शुक्लजी ने तो शायद यह पढ़ा भी हो। वह कहते हैं - इसलिए भी समीक्षा करनी चाहिए। हिंदी साहित्य का इतिहास नए सिरे से लिखना चाहिए।

उनकी किताब से गोरे अफसरों ने पंजाबी सीखी

श्रद्धाराम फिल्लौरी अंग्रेजों की आंख की किरकिरी रहे मगर उन्हीं की लिखी किताब पंजाबी बातचीत पढ़कर गोरे अफसरों ने पंजाबी सीखी। इसका रोमन लिपि में