पांच-दस साल तक पैदा हो सकेंगे डिज़ाइनर बेबी
लायलपुरखालसा कॉलेज में टॉलरेंस एंड प्लांट्स बायोटेक्नोलॉजी विषय पर नेशनल कॉन्फ्रेंस के दूसरे दिन पीयू चंडीगढ़ के बायोटेक्नोलॉजी विभाग के असिस्टेंट प्रो. कश्मीर सिंह रिसोर्स पर्सन थे। उन्होंने स्टूडेंट्स को नेक्स्ट जेनरेशन सिक्वेंसिंग के बारे में बताया। उन्होंने बताया साल 1953 में डीएनए को खोज गया। 60 साल में इसमें बहुत सारी डेवलपमेंट हुईं। डीएनए की वेरिएशन की बात करें तो हर आदमी में फर्क होता है। ये वेरिएशंस कहां होती हंै, यह जानने के लिए डीएनए के चार बेसिस को बाहर निकाल कर मॉडीफाई किया जाता है। ये चार बेसिस हैं - एडेनिन, गुयेनिन, साइटोसिन और थायमीन।
उन्होंने बताया नेक्स्ट जेनरेशन सिक्वेंसिंग की मदद से पांच-दस साल तक हम डिजाइनर बेबी भी पैदा कर सकते हैं। डीएनए में कुछ केरेक्टर कोट प्रोटीन होते हैं। हम एक प्रोटीन को दूसरे प्रोटीन से मॉडीफाई कर सकते हैं। अगर बेबी की आंखों का रंग भूरा है और आप चाहते हैं नीला हो तो यह भी संभव हो सकता है। यहां तक कि बालों और स्किन का कलर भी आप मनचाहा करवा पाएंगे।
डीएनए सिक्वेंसिंग की मदद से दवाइयां भी पर्सनलाइज्ड हो जाएंगी। जैसे अभी हम डॉक्टर के पास जाते हैं तो वो कितने मरीजों को एक ही जैसी दवाई रिक्मेंड करते हैं जबकि कुछ साल में ऐसा पॉसिबल हो सकेगा कि एक व्यक्ति के लिए एक विशेष दवा होगी जिसे वही इस्तेमाल कर पाएगा।
यहां प्रिंसिपल गुरपिंदर सिंह समरा, प्रो. रछपाल सिंह संधू, प्रो. अरुणदेव शर्मा भी थे।
बाल और स्किन कलर भी मनचाहा करवा पाएंगे आप
जीएनडीयू के बायोटेक्नोलॉजी विभाग के प्रो. डॉ. प्रभजीत सिंह ने कहा ग्लोबल वार्मिंग के कारण हम सूखे की समस्या से भी जूझ रहे हैं। सूखे दौरान पौधों को कैसे जीवित रखें? यह बड़ा सवाल है। जब पौधों को पानी कम मिलेगा तो मिट्टी में नमक की मात्रा ज्यादा रहेगी जोकि पौधों के लिए नुकसान दायक है। इससे पैदावार भी कम होगी, कई बार पौधों को उनके मुताबिक टेंपरेचर नहीं मिलता। इसके लिए वह कुछ जींस पर काम कर रहे हैं।
अपने रिसर्च वर्क बारे डॉ. कश्मीर सिंह ने बताया हमारे देश में अंगूर पर दो तरह की फंगल बीमारियां पाई गई हैं। बीमारियों की वजह से अंगूरों के ऊपर व्हाइट पाउडर जैसा तत्व लग जाता है जो सेवन के लिए हानिकारक है। हम उनके प्रोटीन पर काम कर रहे हैं ताकि अंगूर की पैदावार सही ढंग से हो और बीमारियां भी दूर रहें।