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गंदगी से शहर में फैल रही हैं बीमारियां, पब्लिक की किसी को कोई फ्रिक नहीं

4 वर्ष पहले
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साॅलिड वेस्ट मैनेजमेंट ही है प्रॉब्लम का हल

जालंधर | शहरमें सफाई व्यवस्था का बुरा हाल है। मेन रोड्स पर डंपों पर बेसहारा पशु नजर आते हैं। रूटीन में सफाई नहीं हो रही है। सफाई सेवकों की कमी है। करीब 800 किलाेमीटर सड़कें ऐसी हैं जहां सफाई के लिए मुलाजिम नहीं है। निगम के पास जो संसाधन है उन्हें भी पूरी तरह इस्तेमाल नहीं किया जा रहा। सफाई व्यवस्था सुधारने के लिए सभी को जिम्मेवारी लेनी होगी। नगर निगम सफाई के लिए बीट तय करे। बीट सिस्टम के ऊपर सेनेटरी इंसपेक्टर, चीफ सेनेटरी इंस्पेक्टर की जिम्मेवारी तय होनी चाहिए। घर के आगे की सड़क को ही साफ कर देंगे तो शहर साफ हो जाएगा। म्यूनिसिपल कारपोरेशन के हेड को हर तरह की जिम्मेवारी लेनी पड़ेगी। शहर को घर समझना होगा और जैसे घर को संभालते हैं, वैसे ही शहर संभालना होगा। सफाई सेवकों की कमी है तो भर्ती होनी चाहिए।

शहर के पुराने बाशिंदे कभी जीटी रोड की खूबसूरती को नहीं भूल सकते। लेकिन जरा आज की जीटी रोड के बारे में भी सोच लें। यहां एक प्लाजा चौक है। यहां पर रोजाना इतना कूड़ा जमा होता है कि सड़क की एक साइड बंद हो जाती है। कूड़ा उठाने के लिए अाने वाले ट्रक जिस भी रोड से गुजरते हैं, कूड़ा बिखेरते जाते हैं। समस्या की जड़ शहर से कूड़ा उठाने की लचर व्यवस्था और कूड़े को खत्म करने वाला कारखाना होना। जमशेर में कारखाना लगाने की बात होती है तो विधायक परगट सिंह को मंजूर नहीं होता। दूसरी जगह की बात होती है तो वहां के विधायकों की सहमति नहीं मिलती। वरियाणा में प्लांट लगाने की बात होती है लेकिन ये भी नहीं बनती। जिससे कूड़े की समस्या बेकाबू हो गई है।

सूबे में एक पुरानी कहावत है। खाना अमृतसर का... कमाना लुधियाना का और रहना जालंधर का। सूबे के बड़े शहरों में रहने के लिए जालंधर को सबसे अच्छी जगह कहा गया। लेकिन आज यहां पर सीजनल बुखार, डेंगू और चिकनगुनिया बढ़ते ही जा रहे हैं। आखिर वातावरण गंदा है तो लोग कैसे तंदरुस्त रह सकते हैं? साॅलिड वेस्ट मैनेजमेंट की तरफ किसी का ध्यान ही नहीं है।

जय किशन सैनी (सिटीके फर्स्ट मेयर रहे हैं)

रिटा. जस्टिस एनके सूद (पूर्वलोकपाल, हरियाणा)

} पाॅलिटिकल इच्छाशक्ति से ही साॅलिड वेस्ट मैनेजमेंट प्लांट स्थापित हो सकते हैं। सरकार को लोगों की जरूरत को पहल देनी चाहिए।

} शहरों की आबादी लगातार बढ़ रही है। आज तक हम जुगाड़ तरीके से शहर का सफाई का काम चल रहा है। मैनपावर की कमी और इसका भी सही इस्तेमाल होने की बात निगम हाउसेज में बात उठाई जाती है। इस तरफ ध्यान दें।

} नगर निगम रेवेन्यू कलेक्शन के संसाधनों की तरफ ध्यान नहीं दे रहा जबकि खर्च लगातार बढ़ रहा है। पैसे की कमी के चलते ही कूड़ा उठाने को नई मशीनरी नहीं खरीदी जा सकी है।

} जब तक लोगों को सही तरीके से काॅलोनियों में कूड़ा फेंकने वाले बिन नहीं मिलेंगे, तब तक वह यहां-वहां ही कूड़ा फेंकेंगे। जो नई काॅलोेनियां मंजूर की जाती हैं, वहां पर गार्बेज पॉइंट की जमीन भी तो रिजर्व होनी ही चाहिए।

निगम अपना सिस्टम सुधारे, पब्लिक सहयोग करे

इसशहर को दो बातें करनी होंगी। पहला- शहर के लोग खुद सड़कें-काॅलोनियां साफ रखना सीखें और नगर निगम अपने सिस्टम में सुधार करें। ये पुराना शहर है। संकरी गलियों में बड़े-बड़े ट्रक नहीं जा सकते। पुराने शहर में कूड़ा सेग्रिगेशन की जगह भी नहीं है। ऐसे में हल तो तलाशने होंगे। नगर निगम के स्टाफ को जब आप यही कहेंगे कि सारा कूड़ा प्लाजा चौक में फेंकना है तो वह वहीं पर फेंकेंगे। उन्हें जगह तो बनाकर दीजिए। दूसरा- रोजाना जो 500 मीट्रिक टन कूड़ा शहर से निकलता है, इसे जलाकर बिजली बननी चाहिए। खाद भी बनाई जाए तो ये खत्म होगा। जालंधर सिटी को स्मार्ट बनाने की बात हो रही है लेकिन कोई प्रोजेक्ट स्टार्ट ही नहीं हुआ है।

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