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स्टूडेंट्स से डिस्कस नहीं हो रहे उनके फील्ड में हो रहे बदलाव

4 वर्ष पहले
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सीएसआईआरके सीएसओ यानी सेंटर ऑफ साइंटिफिक इंस्ट्रूमेंट ऑर्गेनाइजेशन में मैं चीफ सेक्रेटरी रहा हूं। बतौर रिसोर्सपर्सन देश के विभिन्न हिस्सों में स्टूडेंट्स के साथ इंटरेक्शन करने का मुझे मौका मिला। वीसी बनने से पहले शहर में भी इंटरेक्शन हुई तो पाया कि बहुत कम बच्चे क्लास में सवाल पूछते हैं। कुछ तो तभी क्लास में आते हैं जब लेक्चर खत्म होने लगता है। इससे पता चलता है कि साइंस हो, इंजीनियरिंग हो या फिर आर्ट्स। स्टूडेंट्स वहीं पढ़ रहे हैं जो बरसों से सिलेबस में शामिल है।

होना यह चाहिए कि फिजिक्स, केमिस्ट्री, बायोटेक, बायोलॉजी, मैथ, सिविल इंजीनियरिंग, कंप्यूटर साइंस, लिटरेचर आदि में रिसर्च प्रोजेक्ट मेंडेटरी होने चाहिए। यह यूनिवर्सिटियों की भी जिम्मेदारी होती है कि वे ग्रेजुएशन से लेकर एमए तक रिसर्च प्रोजेक्ट बनाएं और लागू करें। अगर यूनिवर्सिटी ऐसा नहीं कर रही तो कॉलेज या स्कूल अपने लेवल पर इनीशिएटिव लें। जो भी स्टूडेंट का सब्जेक्ट है या फिर स्ट्रीम है, दुनियाभर में उसे लेकर क्या काम हो रहा है, उस पर रिसर्च प्रोजेक्ट करवाएं। जैसे स्कूल में एक जीरो पीरियड हुआ करता था, वैसे ही एक सब्जेक्ट स्ट्रीम या फिर सब्जेक्ट से जुड़ा हुआ हो। अगर लिटरेचर है तो दुनियाभर में लिटरेचर में कैसे एक्सपेरिमेंट हो रहे हैं, यह बताया जाए। अगर कंप्यूटर साइंस है तो टेक्नोलॉजी, अगर सिविल इंजीनियरिंग है तो दुनियाभर में कैसे मॉडल इस्तेमाल हो रहे हैं। कॉलेजों स्कूलों में सदियों पुराने सिलेबस के मुताबिक पढ़ाया जा रहा है। सिलेबस अपग्रेड करें। अगर यूनिवर्सिटी एफिलिएशन के कारण नहीं कर पा रहे तो खुद हीं एक पीरियड ऐसा रख लें। हर सब्जेक्ट का टीचर अपने स्टूडेंट्स को माइनर, मेजर प्रोजेक्ट करवाए ताकि उनका माइंड डेवलप हो।

एजुकेशनल इंस्टीट्यूट्स की तादाद बढ़ी पर है। क्वालिटी पर भी फोकस करना चाहिए।

समय के साथ अपग्रेड नहीं हुए तो होगा बड़ा नुकसान

मैंभी शहर के एक स्कूल से पढ़ा हूं। शहर में बहुत अच्छे स्कूल और कॉलेज हैं, लेकिन अब समय के साथ अपग्रेड होने की जरूरत है। जब बहुत कम स्टूडेंट्स सवाल पूछते हैं या फिर लेक्चर खत्म होने के बाद आते हैं तो समझ में जाता है कि उस इंस्टीट्यूशंस में स्टूडेंट्स से ओपन डिस्कशन नहीं हो रही। अगर एक पीरियड या एक सब्जेक्ट ऐसा हो जहां स्टूडेंट को जानना है कि इस विषय पर दुनिया के कौन से देशों, कौन सी यूनिवर्सिटी में काम हो रहा है तो यकीन मानिए स्टूडेंट्स का कॉन्फिडेंस बढ़ेगा, वे इंटरेक्शन करेंगे और उन्हें जीवन में क्या करना है उसमें क्लेरिटी हो पाएगी।

डॉ. एके पॉल

(वीसी डीएवी यूनिवर्सिटी)

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