5वें मैटर ऑफ स्टेट में नैनो सेकेंड का भी फर्क रहे तो नहीं उड़ सकते रॉकेट
हमनेतीन स्टेट ऑफ मैटर पढ़े और सुने हैं। ठोस, द्रव्य और गैस। चौथे मैटर के रूप में हम प्लाज्मा को जानने लगे हैं। पांचवां मैटर जिस पर लगातार रिसर्च चलती रही है, वो है बोस आइंसटाइन कंडेनसेट। इसे विशेष तौर पर बने कैमरों से ही देख सकते हैं। इसका अस्तित्व बचाए रखने के लिए इसका तापमान 100 नैनो कैलविन तक ठंडा रखा जाता है। यह बातें जेएनयू में स्कूल ऑफ फिजिकल साइंसेज़ के प्रो. अरण्य भट्टाचार्य ने केएमवी में फिजिकल साइंसेज़ पर सेमिनार दौरान बताईं।
उन्होंने कहा भले ही इस थ्यूरी की खोज भारतीय वैज्ञानिक सत्येन्द्र नाथ बोस और जर्मन वैज्ञानिक अलबर्ट आइंसटाइन ने मिलकर की थी लेकिन इसे प्रैक्टिकली एक्सपेरिमेंट में बरसों लगे। 2001 में इसको लैब में प्रैक्टिकली लाने के लिए साइंटिस्ट्स एरिक कॉरनैल, वॉल्फगैंग और कार्ल वाइमैन को नोबल पुरस्कार भी मिला था। बकौल भट्टाचार्य दरअसल यह एक तरह की गैस है जिसे फिलहाल लैब में तय तापमान के भीतर ही देखा जा सकता है। अगर तापमान कम हुआ तो यह नष्ट हो जाती है। अप्लाइड साइंस में इसका फायदा कैसे लिया जा सकता है, उस पर काम चल रहा है। कैसे? इस पर उन्होंने बताया इस मैटर का इस्तेमाल नेचुरल फिजिक्स लेबोरेटरी में स्टैंडर्ड टाइम सैट करने में किया जा रहा है। इसका अर्थ है जब हमें रॉकेट या सेटेलाइट लॉन्च करना होता है तो हमें एकदम सटीक समय का ध्यान रखना होता है, क्योंकि अगर नैनो सेकेंड्स भी हम गलत गिन लें तो रॉकेट लॉन्च हो या फिर सेटेलाइट, फेल हो सकता है।
साइंटिस्ट एस्ट्रोनॉमी और स्पेस साइंस कम्यूनिकेशन एंड पोपुलराइजेशन से आए साइंटिस्ट डॉ. अरविंद रानाडे ने तारों के जन्म और मरन बारे बताया। उन्होंने कहा, हमेशा यह दुविधा रही है प्लूटो ग्रह है या तारा? इसके जवाब से पहले हम यह जानते हैं ग्रह तारे से कैसे अलग हैं। जब से ब्रह्मांड बना है, तब से प्लूटो के पथ पर जिरोन भी सूर्य के चक्कर लगाता है। इसी कारण प्लूटो ग्रह की गिनती में नहीं आता है। उन्होंने बताया 4.5 बिलियन साल बाद सूर्य जो आज हमें पीले और संतरी रंग में दिखता है, वह सफेद रंग का हो जाएगा।
सिर्फ स्पेशल कैमरे से देख सकते इसे, इसे लैब में लाने वाले तीन साइंटिस्ट्स को मिला था नोबल प्राइज़
एसजीटीबी खालसा कॉलेज, दिल्ली यूनिवर्सिटी में फॉरेंसिक साइंस के प्रोफेसर डॉ. गुरविंदर सिंह सोढी ने तकनीकी रूप से क्राइम सीन में रिसर्च कैसे करनी चाहिए बारे बताया। उन्होंने कहा फॉरेंसिक अफसर का इमेजिनेटिव होना जरूरी है। क्राइम सीन को ऐसे देखना चाहिए कि एक ही बार यहां सबूत खोजने का मौका मिला है और अगर संदिग्ध हालात में कोई भी मौत होती है तो उसे सबसे पहले मर्डर मानते हुए सबूत खोजने चाहिए। पूरे मामले पर रिसर्च करके ही गहराई तक पहुंचा जा सकता है।
डॉ. अरविंद रानाडे, प्रो. अरण्य भट्टाचार्य और डॉ. गुरविंदर सिंह सोढी का प्रिंसिपल डॉ. अमिता शर्मा ने स्वागत किया।