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जालंधर गुलाब देवी ट्रस्ट ने 400 करोड़ के अस्पताल को मैरिज पैलेस बनाया

5 वर्ष पहले
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जालंधर। देश लाला लाजपत राय की 150वीं जयंती मना रहा है। उनकी एक ही व्यक्तिगत आकांक्षा थी। मां गुलाबदेवी की याद में अस्पताल बनाना। उनकी शहादत के बाद लाहौर में यह बना भी। बंटवारे के बाद एक जालंधर में भी। लाहौर वाला जहां पीजीआई जैसा मेडिकल कॉलेज बन गया। वहीं 400 करोड़ की मिल्कियत वाला गुलाब देवी अस्पताल जालंधर आज चल भी नहीं पा रहा।
देश की आजादी के अलावा भी लाला लाजपत राय का एक निजी मगर विराट समाज से जुड़ा सपना था। कोई भी भारतीय उनकी मां की तरह टीबी से न मरे। अपनी मां गुलाब देवी की याद में वह अस्पताल बनाना चाहते थे। उन्होंने 1927 में लाहौर में दो लाख रुपये से ट्रस्ट बनाया। वह तो अंग्रेजों से लड़ते हुए शहीद हो गए मगर उनके अनुयायियों ने उनका सपना मरने नहीं दिया। अंग्रेज सरकार से 40 एकड़ जमीन खरीदी। अस्पताल बनाया। महात्मा गांधी के हाथों 17 जुलाई 1934 में यह शुरू हुआ। लालाजी को इससे बड़ी श्रद्धांजलि और क्या हो सकती थी, गुलामी के उन दिनों में।
बंटवारे में इस अस्पताल को वहीं छूटना था। मगर सपना कैसे पीछे छूटता! पिछले दिनों भास्कर में आपने पढ़ा ही था कि कैसे लाहौर से खाली हाथ आए लाला मोहनलाल नागपाल जैसे ट्रस्टियों ने जालंधर में भी गुलाब देवी अस्पताल बनाने की ठानी। रायजादा हंसराज की पत्नी लाल देवी और पुनरवास मंत्रालय से दान में जमीन मिली। नेहरू सरकार में सेहत मंत्री रहीं राजकुमारी अमृत कौर ने भी सहयोग दिया। 1955 की बैसाखी में यह अस्पताल भी शुरू हो गया।
टीबी से लड़ने वाला उत्तर भारत का सबसे बड़ा अस्पताल बनते इसे देर नहीं लगी। बाकी बीमारियों के इलाज का भी बड़ा केंद्र। आईएमए जालंधर के अगले प्रधान चुने गए डॉ. जौहल याद करते हैं : गुलाब देवी में मेरी भी सर्जरी हुई थी। मैं सातवीं में पढ़ता था। अचानक सर्जरी करनी थी। मेरे पेरेंट्स मुझे यहीं लाए। शहर की उस सड़क का नाम ही गुलाब देवी रोड हो गया, जैसा हम आज भी जानते हैं।

जलवा इतना था कि सत्तर के दहाके तक यह दोआबा ही नहीं, पंजाब भर का सबसे भरोसेमंद अस्पताल हो गया। तब नए डॉक्टरों का सपना होता था कि इसमें सेवा दें। नाम अपने आप हो जाता था। मुझे गुलाबदेवी ने ही डॉ. एचजे सिंह नाम दिया, रणजीत अस्पताल के एमडी कहते हैं। यहीं से पारंगत होकर निकले कई डॉक्टर आज निजी अस्पतालों के प्रमोटर हैं। पटेल अस्पताल के डॉ. एसके शर्मा और डॉ. बीएस चोपड़ा, टैगोर के डॉ. विजय महाजन, बत्तरा अस्पताल के डॉ. विनोद बत्तरा, लाजवंती के डॉ. वीके वासुदेव भी। ये सिर्फ उदाहरण के लिए। गिनती बड़ी है।

सत्तर के दहाके में यह 300 बेड का अस्पताल था। बरामदे में भी सैटियां लगाकर इलाज होता था। रोजाना 600 से भी ज्यादा मरीज आते थे, सिविल हॉस्पिटल से भी ज्यादा, डॉ. महाजन कहते हैं। शायद यही कारण होगा कि 1978 में सरकार ने इसे मेडिकल कॉलेज बनाने की पेशकश की। आज यह बताने वाला कोई नहीं है कि ट्रस्ट ने क्यों यह पेशकश ठुकराई। तब इसके सचिव रहे डॉ. केके पसरीचा अब इस संसार में नहीं हैं। तबके मेडिकल सुपरिंटेंडेंट डॉ. विजय महाजन कहते हैं, मेडिकल कॉलेज के लिए 25 एकड़ जमीन चाहिए थी, यहां 34 एकड़ जमीन थी। मगर ट्रस्ट फैसला नहीं कर पाया। क्यों नहीं? वह नहीं बताते हैं। डॉ. एसके शर्मा की मानें तो मैनेजमेंट के पास स्पष्ट सोच नहीं थी।

नब्बे के दशक में इसमें ठहराव आने लगा। मेडिकल कॉलेज न बन पाना उतना चिंताजनक नहीं है, जितना यह कि आज गुलाब देवी अस्पताल सिर्फ नाम के लिए खड़ा है। आज यहां गिनती के चार डॉक्टर हैं। मरीज भी उतने ही आते हैं। नर्सिंग कॉलेज चल रहा है मगर पिछले दिनों छात्रों का हंगामा और फिर प्रिंसिपल का लापता होना चिंताजनक है। ये पैसों की ज्यादा लाचारी रही होगी या सोच की? इसे चलाने के लिए यहां मैरिज पैलेस खोल दिया गया है। राष्ट्र लाला लाजपत राय की डेढ़ सौवीं जयंती मना रहा है मगर उनका सपना तो यहां चूर-चूर हो रहा है।

लाहौर ने अलबत्ता उस महान स्वप्न को और भी विस्तार दे दिया। उन्होंने अपने मूल अस्पताल को 2006 में सुपर-स्पेशिएलिटी मेडिकल कॉलेज बनाया। कसूर में नया अस्पताल भी खोला तो गुलाब देवी के ही नाम पर। पिछले साल डॉ. पसरीचा के निधन के बाद अब उनके बेटे डॉ. राजेश के पास ही गुलाब देवी ट्रस्ट का जिम्मा आ गया है। क्या वे इसे पुरानी बुलंदी पर पहुंचा पाएंगे? ट्रस्ट में शहर के नामचीन नाम हैं मगर अपनी मजबूरी और मसरूफियत के कारण वे समय नहीं देते हैं। जैसा ट्रस्ट के प्रधान यशराज अग्रवाल कहते हैं – सेहत सही नहीं रहती है, इसलिए मैं समय नहीं दे पाता हूं।

डॉ. राजेश कहते हैं, मैंने नई मैनेजमेंट कमेटी बना दी है। वह इसे संभालेगी। इसे मेडिकल कॉलेज बनाएगी। जानकार भी कहते हैं, गुलाबदेवी आगे बढ़ सकता है, बशर्ते मैनेजमेंट में हितों का टकराव न हो। जैसे उनके पिता अपना पसरीचा अस्पताल चलाते थे और गुलाबदेवी भी, उसी तरह डॉ. राजेश भी अपना सत्यम अस्पताल चलाते हैं। यही सबसे बड़ी चुनौती है।
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