पतंग तो अब भी उड़ती है पर हवाएं रुख नहीं बदल पातीं

9 वर्ष पहले
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अलावलपुर।

छह साल का था अलावलपुर का तेजिंदर। पतंग उड़ा रहा था। हवा ने पतंग का रुख बदला और पतंग ने जिंदगी की दिशा। पतंग बिजली की तार में फंस गई। छुड़ाने गया तो करंट लग गया। डाक्टर को दोनों हाथ काटने पड़े। हाथ चले गए, जिंदगी कुछ अधूरी सी लगने लगी। सात साल किसी स्कूल ने दाखिला नहीं दिया। मां को चिंता थी। घर में पढ़ाना शुरू किया। पैर हाथ हो गए। पैर से खाना और पैरों से ही किताबों के पन्ने पलटे जाने लगे। अच्छे से पढऩा लिखना आ गया तो स्कूल में दाखिला भी मिला। अब ग्यारहवीं में पढ़ते हैं।


तेजिंदर का मानना है कि ये सब हौसले की बदौलत ही है। दोस्तों को फुटबाल खेलते देखा तो खुद भी खेलना शुरू किया। खेलना सिर्फ खेलने के लिए नहीं बल्कि जीतने के लिए भी। फुटबाल के कई मैचों में अपनी टीम का अहम हिस्सा बने। वक्त के साथ हाथों की शक्ति मानों पांव में आ गई हो। दौडऩा शुरू किया तो जिला स्तरीय प्रतियोगिता के विजेता हो गए। तत्कालीन शिक्षा मंत्री बीबी उपिंदरजीत कौर भी दंग रह गईं। सम्मानित भी किया। फुटबाल और दौड़ के बाद रुचि जागी साहित्य में। कविता गाई तो कई जिला स्तरीय मुकाबले जीते। हाथ की मानों जरूरत ही क्या है। कंप्यूटर सीखने को दिल किया। सीखा भी। अच्छी तरह कंप्यूटर चलाते हैं, पांव से। अब सपना सरकारी नौकरी का। उम्मीद है वो भी मिलेगी क्योंकि जिंदगी उन्हें ही सब कुछ देती जो उम्मीद रखते हैं। जरूरत है सिर्फ मेहनत करने की।


तेजिंदर के पिता वेद प्रकाश कहते हैं- सिर्फ छह साल की उम्र में दोनों हाथ कटने पर बाद हमने तो हौसला छोड़ दिया था। परिवार में सबसे छोटा था। लाड़ला भी। जिंदगी भर की कमाई इलाज पर लगा दी। पढऩा चाहता था। मां ने पढ़ाया। हिम्मत बंधी। इसके बाद वो हुआ जिसकी किसी को उम्मीद तक न थी। आठवीं 70 फीसदी, दसवीं 71 फीसदी नंबरों के साथ पास की। जिंदगी से कोई रंज नहीं। शिकायत सिर्फ बदलती सरकारों से। सभी ने मदद का वायदा किया। दी तो सिर्फ अढ़ाई सौ रुपए की पेंशन। वो भी चार महीने के बाद दम तोड़ गई।