अमृतसर. वह आजादी के जश्न का समय था। परेड कमांडर डीएस रंधावा 28 साल के थे। सीने पर मिलिटरी क्रॉस। माउंटबेटन ने पूछा - यंगमैन, ये कहां जीता? कोहिमा में। यह किस्सा सुनाते ही 94 साल के कर्नल रंधावा जोश से भर जाते हैं। 1944 में दूसरे विश्व युद्ध में बर्मा मोर्चे पर थे। कोहिमा की पहाड़ी पर आ चुके थे जापानी। इतने करीब, न वो गोली चला सकते थे। न हम। संगीनों का ही सहारा था। मैंने चार जापानी मार गिराए। जख्मी मैं भी हुआ। तब मिलिटरी क्रॉस सैम मॉनेकशॉ को भी मिला था।
मगर रंधावा यह वीरता पुरस्कार पाने वाले वह सबसे युवा अफसर थे। इसीलिए परेड को कमांड करने का मौका भी उन्हीं को मिला। उनकी पत्नी सतवंत कौर बताती हैं। मगर कर्नल तो इससे भी रोमांचक किस्सा सुनाने को बेताब हैं। मैं ही अकेला भारतीय अफसर हूं, जिसने गोरे अमेरिकी लड़ाकों को रस्से से बांध दिया था।
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