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डाउनलोड करेंजालंधर. शताब्दी का हाईटेक एलएचबी कोच भले ही सफर को सुहाना बनाता है, मगर इसमें चढऩा-उतरना बेहद खतरनाक है। वजह है इसका फुट-रेस्ट। शताब्दी का पायदान घर में लगी सीढ़ी की तरह तिरछा होता है। यानी जितना ऊपर का फुट-रेस्ट प्लेटफार्म से उतना ही दूर। सामान्य कोच में ऐसा नहीं है। सामान्य कोच के पायदान एक सीध में होते हैं और प्लेटफार्म के इतने पास कि कभी फिसल भी गए तो प्लेटफार्म पर ही गिरेंगे रेल लाइन पर नहीं।
शताब्दी के पायदान की प्लेटफार्म से ज्यादा दूरी के कारण ही गुरु गोबिंद सिंह नगर के रिटायर्ड मेजर ओंकार सिंह कत्याल की जान चली गई थी। रेल अधिकारी भी इस बात से इत्तफाक रखते हैं कि नई तकनीक के एलएचबी कोच बनाए जाने लगे मगर प्लेटफार्म की बनावट वैसी ही है, जैसे पहले हुआ करती थी।
आरसीएफ, कपूरथला में जीएम रहे और वर्ष २००२ में रेलवे बोर्ड से रिटायर्ड अधिकारी बताते हैं कि एलएचबी (लिंक हाफमैन बुश) कोच का पायदान घर की सीढ़ी की तरह बनाया गया है। ऊपरी पायदान कटा हुआ होता है। यात्रियों को इसके लिए अभ्यस्त होना होगा। जैसे हम घर में सीढिय़ां चढते सावधानी बरतते हैं, उसी तरह सावधान रहना होगा। दिल्ली मेट्रो के कोच भी एलएचबी हैं, लोग चढ़-उतर रहे हैं। ट्रेन के सामान्य कोच के पायदान नीचे तक होते हैं, जो छोटे स्टेशनों के कम ऊंचे प्लेटफार्म के लिए भी फिट होते हैं।
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