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जिले में अफसरों का डेरा, नहीं मिल रहा बसेरा

8 वर्ष पहले
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पठान कोट। जिला बनने के लगभग दो वर्ष के बाद भी पठानकोट में तैनात अफसर रिहायश के लिए मारे-मारे फिर रहे हैं। स्थिति यह है कि कुछ अफसरों ने तो अपने रिश्तेदारों के यहां डेरा डाला हुआ है तो कुछ मजबूरीवश गैस्ट हाउसों में रहकर समय काट रहे हैं। डीसी, एसएसपी के पास भी नहीं अपनी रिहायश जिलाधीश सिबिन सी व एसएसपी डॉ. सुरिंद्र कालिया के पास भी सरकारी रिहायश नहीं है।

डीसी माधोपुर के रेस्ट हाउस में रहने को मजबूर हैं तो एसएसपी बिजली बोर्ड के रेस्ट हाउस में रह रहे हैं। वहीं, एडीसी डॉ. बलजीत सिंह भी बदल-बदल कर रेस्ट हाउसों में रहकर समय बिता रहे हैं।असिस्टेंट कमिश्नर जनरल संदीप गाड़ा ने सितंबर 2012 में कार्यभार संभाला था। वह जुगियाल में एक सरकारी विभाग के आईपी रेस्ट हाउस के एक कमरे में रहने को विवश हैं। उनका कहना है कि उच्चाधिकारियों को रिहायश के लिए लिखा गया है। जब तक रिहायश नहीं मिलती, तब तक कहीं न कहीं रहकर ऐसे ही समय काटना पड़ेगा।

डीडीपीओ व सिविल सर्जन के पास न गाड़ी न घर डीडीपीओ (डिस्ट्रिक डेवल्पमेंट पंचायत अफसर) लखविंद्र सिंह को कार्यभार संभाले एक महीना हो गया है। उन्हें न तो अभी तक सरकारी गाड़ी मिली है और न ही सरकारी आवास। वह भदरोआ में अपने रिश्तेदार के घर में रह रहे है। सिविल सर्जन डा. गुरदित सिंह सोढ़ी ने अप्रैल 2013 के अंत में सिविल अस्पताल में कार्यभार संभाला है। उनके पास भी न तो सरकारी गाड़ी है और न ही रिहायश। उन्हें अपनी जेब से पसर्नल कार से पेट्रोल खर्च करने इधर-उधर जाना पड़ता है। रिहायश न मिलने के वह शाहपुरकंडी के रेस्ट हाउस में रह रहे हैं।

उधर, जिला रेन्यू अफसर गुरनाम सिंह रायपुरी मोहाली से आए हैं और वर्तमान में शाहपुरकंडी के रावी सदन में डेरा जमाए हुए हैं। उनका कहना है कि सरकारी क्वार्टर न मिलने उन्हें बेहद परेशानी हो रही।है। सभी अफसरों का कहना है इस बाबत डीसी को बता दिया गया है। सरकार को भेजी गई है प्रपोजल

जिले के अधिकारियों व अन्य सरकारी कर्मचारियों के लिए आवास की व्यवस्था की प्रपोजल बनाकर राज्य सरकार को भेज दी गई है। मंजूरी मिलते ही सरकारी आवास की व्यवस्था मुहैया करवा दी जाएगी। - सिबिन सी, जिलाधीश, पठानकोट।

परेशानी

कुछ ने अपने रिश्तेदारों तो कुछ ने गैस्ट हाउसों में डाला हुआ है डेरा > आवास न मिलने से अफसरों को फैमिली

साथ रखने में भी हो रही मुश्किल