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डाउनलोड करेंजालंधर/फगवाड़ा. पानीपत-जालंधर सिक्सलेन प्रोजेक्ट पूरी तरह से ठप है। बैंकर्स ने कंपनी को और पैसा देने से इनकार कर दिया है और निर्माण कंपनी सोमा ने हाथ खड़े कर दिए। नतीजा यह है कि रामामंडी, पीएपी और चौगिट्टी के फ्लाईओवर का काम फंसा पड़ा है। पुल अधूरे होने के कारण ट्रैफिक तो प्रभावित हो ही रहा है, हादसे भी रुक नहीं रहे हैं।
इस प्रोजेक्ट के शुरू होने की उम्मीद अदालत का फैसला आने और प्रोजेक्ट की कीमत रिव्यू होने के बाद ही की जा सकती है, क्योंकि इस प्रोजेक्ट की कीमत 35 सौ करोड़ रुपए आंकी गई थी।
पंजाब में माइनिंग और टोल के इश्यू के चलते कंपनी का काम लटक गया और रेट बढ़ गए। इससे प्रोजेक्ट की कीमत में काफी बढ़ोतरी हुई। सोमा के अधिकारियों के मुताबिक इस प्रोजेक्ट को पूरा करने के लिए 15 सौ करोड़ रुपए की जरूरत है। वहीं कंपनी का अदालती मसलों में उलझ जाना भी प्रोजेक्ट में देरी का कारण है। कंपनी के बड़े अधिकारी भी इस बात को स्वीकार करते हैं कि समय पर ब्याज का भुगतान न होने के कारण बैंकों द्वारा कंपनी को आगे पैसा नहीं दिया जा रहा।
इस समय सोमा ऐसे छोटे-मोटे काम निपटाने में लगी है, जिसमें उनका कोई ज्यादा पैसा नहीं लग रहा है। इसमें रामामंडी पुल के साथ लगती सर्विस लेन के लिए जगह खाली करवाने का काम और पीएपी में पिलरों पर गार्डर लांच करने का काम शामिल है। पीएपी की गार्डर लांचिंग का काम भी अगले कुछ दिन में पूरा होने जा रहा है। चौगिट्टी पुल पर मिट्टी डल चुकी है, लेकिन इसे जोड़ा नहीं जा रहा है। अगर चौगिट्टी की एक साइड को भी शुरू कर दिया जाए तो ट्रैफिक में आने वाली बड़ी बाधा हट जाएगी। लोगों को बार-बार जाम में फंसना नहीं पड़ेगा।
सोमा कंपनी के प्रोजेक्ट अफसर एसके सोबती ने माना कि देरी का कारण फाइनांशियल क्राइसिस है। टोल टैक्स से एकत्र होने वाली राशि से ब्याज भी पूरा नहीं होता। टोल बैरियर से करीब 26 करोड़ की आमदनी होती है, जिसमें से 4-5 करोड़ एनएचएआई को जाता है। इसके बाद 21 करोड़ रुपये बचता है जबकि बैंक का ब्याज ही 22 करोड़ है। कंपनी ने करनाल तथा शंभू बैरियर शिफ्ट करने की मांग की थी, जिसकी एनएचएआई ने मंजूरी नहीं दी। उन्होंने बताया कि प्रोजेक्ट के बैलेंस काम में नुकसान काफी बढ़ गया है।
चार साल पहले शुरू हुआ था काम
हाईवे को चौड़ा करने का काम सोमा कंपनी द्वारा चार साल पहले शुरू किया गया था। इस प्रोजेक्ट को पूरा करने के लिए सोमा कंपनी को 11 नवंबर, 2011 तक का समय दिया गया था। निर्धारित अवधि से डेढ़ साल और बीत जाने के बाद भी अभी यह काम पूरा नहीं हो पाया है।
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