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सौ करोड़ टर्नओवर वाले विल्खू चाहते तो गाड़ी बेच देते पर बहू ने कहा - पापाजी हुण लडऩा चाहिदा

8 वर्ष पहले
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जालंधर. फोर्ड से एंडेवर गाड़ी के विवाद को लेकर चर्चा में आए सतलुज मोटर्स कंपनी के डायरेक्टर कुलवंत सिंह विल्खू कहते हैं-मर जाइए...जद तक अपने हक लई लड़ागें, नई ते दुनिया चक्क के बाहर रख दऊगी। मेरी पत्नी और बेटे कई बार गाड़ी बेचने के लिए कह चुके हैं। लेकिन बहू मेरी तरह सोचती है। कहती है - पापाजी हुण लडऩा ए। यूथ इंडिया नूं बदलना चाहंदा है। हुण गलत बर्दाश नहीं कर सकदा। मुझे गुस्सा कम आता है। हक की बात हो तो गुस्सा काबू नहीं होता। गुरु गोबिंद सिंह जी ने कहा है; 'जभी बाण लागेओ, तभी रोष जागेयो। सोचा हार नहीं मानूंगा। मैं लड़ूंगा।

कुलवंत सिंह बताते हैं कि सतलुज मोटर्स के पांचों डायरेक्टर भाइयों ने एक साथ 2009 में नई गाडिय़ां खरीदी थीं। उन्होंने फोर्ड की एंडेवर ली। बोले - गड्डी कादी लई, मुसीबत ले आंदी घर। 18 लाख रुपए की गाड़ी पर चार साल में नौ लाख रुपए रिपेयर पर खर्च कर चुका हूं। नई गाड़ी में पहले ही दिन माथा टेकने हरमंदिर साहिब गए तो रास्ते में इंजीनियर बेटे शिल्पकार सिंह ने देखा स्टेयरिंग टेढ़ा था। वापस आकर गाड़ी फोर्ड सर्विस स्टेशन भेजी।

मैकेनिक स्टेयरिंग ठीक नहीं कर पाया। कंपनी इंजीनियर्स भी नहीं बुलाया। बाहर से व्हील अलाइनमेंट करवाई, तो स्टेयरिंग सीधा हो गया। तभी बोले-मैं व्हील अलाइनमेंट करने वाले नूं केहा, इन्हां नूं इन्ना ए वी नी पता ते कादे मैकेनिक बने फिरदे ने। गाड़ी 10 हजार किलोमीटर भी नहीं चली थी कि सीट बैठ गईं। कंपनी ने लैदर की जगह रैक्सीन के कवर डाले हुए थे। दरवाजा भी आवाज कर रहा था। कंपनी मैकेनिक ने आवाज बंद करने को फोम फंसा कर काम चला दिया। तब मैं भड़का। सर्विस मैनेजर से कहा- मैं इद्दां गड्डी नी ले के जाणी। पता चला कंप्रेशर जल गया है। 43 हजार रुपए का कंपनी ने एस्टीमेट बना दिया। एक महीने बाद कंपे्रशर फिर जल गया। नया डलवाया। चार बार कंप्रेशर जला। तीन बार खुद पैसा खर्च किया। एक बार कंपनी ने फ्री में डाला।

मेजर ब्रेकडाउन दो साल पहले हुआ। गाड़ी 91 हजार किलोमीटर चली थी। मनाली जा रहे थे। बीच रास्ते गियर बॉक्स फंस गया। जाम लग गया। लोग गाडिय़ों से निकल कर चिल्लाने लगे। ..सरदार जी गड्डी परे हटाओ। मेरी बेज्जती हो गई। परिवार साथ था। बेटा गाड़ी चला रहा था। गाड़ी को वहीं से चंडीगढ़ सर्विस को भेजी। टैक्सी में घर लौटे। तब एक लाख 15 हजार रुपए खर्च आया। फिर चंडीगढ़ सर्विस करानी शुरू की। हर बार आने जाने पर 35 सौ रुपए लगने लगे। फिर यहीं से सर्विस करवा ली।

पिछले हफ्तेे भाई के बेटे की शादी में चंडीगढ़ जाने के लिए गाड़ी में पूरा परिवार बैठा। स्टार्ट करते ही बैक गियर फंस गया। पत्नी नीतू चिलाने लगी-हर वार दा पंगा ए, बेच क्यों नी दींदे मुसीबत नूं। घर में खड़ी छोटी गाडिय़ों से गए। गाड़ी फिर ठीक करवाई। बीते शनिवार घर जाते रास्ते में गाड़ी बंद हो गई। जैस-तैसे घर पहुंचा। रविवार छुट्टी होने के कारण मैं कहीं गया नहीं और गाड़ी भी ठीक करवाने नहीं भेजी। पता नहीं चला कब बहू डोली गाड़ी को मॉडल टाउन ले गई। रात को फोन आया- पापा जी गड्डी खराब हो गई है। मैंने गुस्से में कहा; गड्डी नूं तेल पा के साड़ दे उत्थे ई। बेटा गाड़ी को धक्का मारकर घर लाया। घर आकर मेरी बहु ने भी कह दिया-पापाजी कंपनी नूं सबक सिखा ही देओ हुण तां। सोमवार सुबह मैं गाड़ी लेकर घर से निकाला और नकोदर चौक में गाड़ी फिर बंद। आटो रिक्शा लेकर फोर्ड पहुंचा। ड्राइवर किसी तरह गाड़ी ले आया। वहां सारे ड्रामे के बाद गाड़ी अब एजेंसी ठीक कर रही है।

हम जल्दी गाडिय़ां नहीं बेचते : शिल्पकार

कुलवंत के मैकेनिकल इंजीनियर बेटे शिल्पकार का कहना है कि हम गाडिय़ां कम ही बेचते हैं। मैं तो खुद अपने जो गाड़ी चलाता हूं वो मेरे चाचा ने पांच साल चलाई और अब मैं चला रहा हूं। अभी 61 हजार ही तो चली है। उनके परिवार में छोटी बड़ी तीस गाडिय़ां है। वह पांच सौ से ज्यादा बसें बनाकर बेच चुके हैं।