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कैंसर को दी मात और मंदबुद्धि बच्चों की जिंदगी संवारने में जुट गई

5 वर्ष पहले
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ऐसे बदल रही मंदबुद्धि बच्चों की जिंदगी

गुरप्रीत कौर की मेहनत से नॉर्मल स्कूलों में पढ़ रहे 5 मंदबुद्धि बच्चे

मनीषशर्मा|लुधियाना

जिद,जज्बा और जुनून की यह कहानी है साहनेवाल की गुरप्रीत कौर की। जिन्होंने पहले खुद को हुए कैंसर को मात दी और अब मंदबुद्धि बच्चों की जिंदगी संवारने के लिए जीवन समर्पित कर दिया। कोई खून का रिश्ता होते हुए भी 6 मंदबुद्धि बच्चे घर में रखे और अब उनकी जिंदगी संवारने की जद्दोजहद शुरू कर दी। उनकी इस कड़ी मेहनत की बदौलत 5 बच्चे नॉर्मल बच्चों की तरह सामान्य स्कूलों में पढ़ रहे हैं। जिनके हाव-भाव और पढ़ाई में लगन देख यकीन नहीं होता कि ये वो ही बच्चे हैं जिन्हें किसी चीज का होश तक नहीं होता था।

इस सफर की नींव पड़ी 2004 में। गुरप्रीत फिरोजपुर रोड पर एक प्रयास संस्था में मंदबुद्धि बच्चों को पढ़ाती थीं। अचानक पता चला कि उन्हें ब्रेस्ट कैंसर हो गया। उन्हें लगा जैसे जिंदगी साथ छोड़ देगी। डॉक्टरों ने इलाज शुरू किया। कीमोथेरेपी होती रही। कोई इंप्रूवमेंट दिखी। इधर, एक प्रयास स्कूल के मंदबुद्धि बच्चों को पता चला तो वो अपनी मैडम को दिलासा देने पहुंचे। उनकी अच्छी सेहत की दुआएं कीं। रोज फोन कर हौसला बढ़ाया। इसका असर दिखा और गुरप्रीत कौर की हालत सुधरती चली गई। वो समझ गईं कि इन बच्चों की प्रार्थना ही उनके काम आई। तब अस्पताल के बेड पर ही तय कर लिया कि जिनकी कोई नहीं सुनता, मैं उन्हें संभालूं गी। हालत सुधरी तो घर लौटी और प्रिंसी नामक बच्चे को घर में रखा। उसकी सेवा शुरू की। धीरे-धीरे हालत सुधरती गई तो मालेरकोटला से 5 साल की अलाइवा को ले आईं। यही अलाइवा 4 साल बाद इस वक्त नॉर्मल बच्चों की तरह न्यू मॉडल स्कूल में सेकेंड क्लास में पढ़ रही है। अकेली अलाइवा ही नहीं, जसकरन, हर्ष, हर्षिता और सोनाली ऐसे बच्चे हैं जो अब नॉर्मल स्कूलों में पढ़ाई कर रहे हैं। बदलाव की ये बयार अब तक जारी है।

गुरप्रीत कौर बताती हैं कि मंदबुद्धि बच्चों को फिजियोथेरेपी और स्पीच थेरेपी करवाती हैं। सबसे महत्वपूर्ण मेंटल बिहेवियर है। मैं उन्हें पहले अपने साथ बाजार, बैंक जैसे पब्लिक प्लेसेज पर लेकर जाती हूं। वो मेरा व्यवहार देखते हैं। फिर उन्हें पैसे देकर अकेले भेजती हूं और दिलचस्प बात है कि वो बिल्कुल मेरी तरह अच्छी चीजें खरीदते हैं। मोल-भाव भी करते हैं। इससे उनका सेल्फ कॉन्फिडेंस बढ़ता है और वो समाज में सामान्य जिंदगी जीने के काबिल बन जाते हैं। फिर गलतियों पर डांटती नहीं, प्यार से सही-गलत का फर्क समझाती हूं।

कहते हैं ‘जिनमें अकेले चलने के हौसले होते हैं उनके पीछे एक दिन काफिले होते हैं’ कुछ यही टर्निंग प्वाइंट गुरप्रीत कौर की जिंदगी में आया। मंदबुद्धि बच्चों की सेवा करते एक गारमेंट कारोबारी शामलाल आगे आए। उन्हें अपना मकान दिया ताकि गुरप्रीत ज्यादा बच्चों की सेवा कर सके। आसरा मिला तो गुरप्रीत का हौसला बढ़ा और ‘एक लक्ष्य’ के नाम से खुले स्कूल में आज 32 बच्चे सामान्य जीवन जीने के गुर सीख रहे हैं। 6 बच्चे तो उनके परिवार के साथ ही रहते हैं बिल्कुल अपनों की तरह। जो हर प्रोग्राम में उनके साथ जाते हैं। इसी दौरान दो साल पहले पति जगदीशपाल सिंह को बुखार हुआ और इतना बिगड़ा कि वो कोमा में चले गए। आज भी जगदीशपाल की हालत ठीक नहीं, लेकिन गुरप्रीत कौर ने अपनी सेवा में कोई फर्क नहीं पड़ने दिया। वो कहती हैं अभी काम बाकी है। मेरा मिशन पूरी जिंदगी ऐसे बच्चों के लिए काम कर उन्हें अपने पैरों पर खड़ा करना है। इसीलिए वो अपनी बेटी वंशदीप कौर को भी मेंटल रिटार्ड का डिप्लोमा करा रही हैं ताकि वो आगे उनकी इस अनोखी विरासत को संभालकर उनका सपना पूरा करे। योग और सेवा परिवार से जुड़े इंडस्ट्रियलिस्ट विनोद डावर कहते हैं कि मैंने किसी लेडी को खुद कैंसर होने के बावजूद दूसरों के लिए जीवन समर्पित करने का यह अनोखा समर्पण कहीं नहीं देखा।

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