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मलूका ने \"सरपंची\' वाले तजुर्बे से साधे अफसर और मुलाजिम
सूबेके ग्रामीण विकास एवं पंचायत मंत्री सिकंदर सिंह मलूका सोमवार को यहां अलग ही रंग में नजर आए। उन्होंने महकमे की कमान संभालने के बाद कुछ नया करने के मकसद से सोमवार को गुरु नानक भवन में िडपार्टमेंट की बैठक बुलाई थी। इसमें महकमे के अफसरों और मुलाजिमों को पूरे पंजाब से बुलाया गया। मौका मिला तो अफसरों-मुलाजिमों ने मंच से खुलकर भड़ास निकालते हुए अपनी दिक्कतें रखीं।
महकमे के मंत्री और आला अफसरों की जवाबदेही वाले कड़वे सवालों को मलूका खामोशी से सुनते रहे। जब जवाब देने डायस पर आए तो वह भी सियासी दांव खेलने से नहीं चूके। मंत्री की हैसियत से बोलने के साथ ही जज्बाती होकर बोले कि मैं खुद सरपंच रहा हूं। महकमे की जमीनी सच्चाई बखूबी जानता हूं।
सरकारीइलाज, पढ़ाई से परहेज, नौकरी से क्यों नहीं?
लगेहाथों बतौर मंत्री मलूका ने महकमे के अफसरों-मुलाजिमों को दो-टूक नसीहत दे डाली कि बेशक अपने हक मांगो, मगर ड्यूटी की जिम्मेदारी भी समझो। खिंचाई करते हुए मिसाल देने लगे कि एमएलए, जिला परिषद चेयरमैन हों या सरपंच, जनता के चुने हुए नुमाइंदे होते हैं। जब वे विकास कामों के लिए आते हैं तो महकमे के बहुत से अफसर उनको भाव नहीं देते। प्लीज ऐसा नहीं करना चाहिए, चाहिए कोई सत्ताधारी हो या विपक्षी पार्टी से आए। फिर कमेंट किया कि महकमे से जुड़े कई ऐसे जनप्रतिनिधि हैं, जिनको महकमे के वाहन इस्तेमाल करने का भी हक है, मगर अपने अफसर उनको `लिफ्ट` तक नहीं देते। अगर वे नुमाइंदे अपने अधिकारों के प्रति जागरूक हो जाएं तो दिक्कत पैदा कर सकते हैं।
एक कदम आगे बढ़कर यहां तक कह डाला कि कच्चे मुलाजिम पक्के करने का शोर तो मचाते हैं, मगर नौकरी पक्की होते ही काम में लापरवाह क्यों हो जाते हैं। सरकारी महकमों की इमेज पर मिसाल देते हुए मलूका ने एक प्रचलित चुटकुला भी सुना डाला कि कोई भी सरकारी बस में सफर, सरकारी स्कूल में पढ़ाई और सरकारी अस्पताल में इलाज तक नहीं करना चाहता, मगर नौकरी सबको सरकारी चाहिए, क्यों? दरअसल सरकारी नौकरी में मौजां ही मौजां वाली इमेज है।
इस खुली बैठक में कई दिलचस्प मंजर भी पेश आए। महकमे के मंत्री मलूका ने मंच से दावा किया कि चाहे महकमे के अफसर-मुलाजिम हों या आम लोग, किसी के साथ उनके कार्यकाल में धक्केशाही नहीं होगी। जैसे ही इसके बाद मलूका लौटकर सीट पर बैठे, फौरन गांव सलेमपुर का मंगत सिंह एक शिकाय