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यह पद्धति पंजाब में भी की जा सकती है लागू

7 वर्ष पहले
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थैलेसीमिया मरीजों के लिए बकरे का खून ज्यादा फायदेमंद

निस्वार्थसेवा सोसायटी की ओर से गुरु नानक पब्लिक स्कूल में आयोजित थैलेसीमिया अवेयरनेस सेमिनार के दौरान गुजरात से आए डॉ. अतुल एम. भवसार ने कहा कि थैलेसीमिया के मरीजों के लिए इंसान की बजाय बकरे का खून ज्यादा फायदेमंद है।

गुजरात के शहर अहमदाबाद स्थित अखंडानंद आयुर्वेद अस्पताल के पंचकर्मा डिपार्टमेंट के हेड डॉ. भवसार ने कहा कि थैलेसीमिया से पीड़ित बच्चों को हर 15-20 दिन बाद ब्लड चढ़ाना पड़ता है। क्योंकि इस बीमारी की वजह से ब्लड के आरबीसी (रेड ब्लड सेल) तेजी से टूटते हैं। जिस कारण मरीज में हीमोग्लोबिन की कमी हो जाती है। थैलेसीमिया के मरीजों के लिए उन्होंने एक नई खोज की है। जिसके तहत बकरे का खून चढ़ाने पर मरीज को 15-20 दिन की बजाय दो महीने बाद ही ब्लड चढ़ाने की जरूरत पड़ती है। कई मरीजों को 5 महीने बाद ही खून चढ़ाने की जरूरत पड़ती है।

इसका कारण यह है कि बकरे के खून के आरबीसी जल्दी नहीं टूटते। जिससे मरीज में ज्यादा समय तक हीमोग्लोबिन की मात्रा सही बनी रहती है। डॉ. भवसार ने दावा किया कि इस भयंकर बीमारी से निपटने की कैपेसिटी एलोपैथी के मुकाबले आयुर्वेद में ज्यादा है। थैलेसीमिया में बकरे के खून के इस्तेमाल की पद्धति को गुजरात सरकार ने मान्यता दे दी है। इस पद्धति में मरीज को खून वेन की बजाय एनिमिया के जरिए बड़ी आंत तक पहुंचाया जाता है। यह आंत जरूरत के मुताबिक खून को लेने के बाद बाकी बाहर निकाल देती है। सोसायटी के प्रधान लवली जैन ने आए हुए अतिथियों का स्वागत किया। इस अवसर पर रमेश कपूर, वनीत जैन, मनीष जैन, अंपल जैन, अरिहैद जैन, अमित जैन, हैपी भाटिया, गगन जैन दर्शक जैन भी मौजूद रहे।

थैलेसीमिया अवेयरनेस सेमिनार में गुजरात से आए डॉ. अतुल एम. भवसार ने बताया कि बकरे के खून से मरीज में हीमोग्लोबीन की मात्रा सही बनी रहती है।

आयुर्वेद विभाग पंजाब के डायरेक्टर डॉ. राकेश शर्मा ने बताया कि सरकार ने इस पद्धति को पंजाब में भी लागू करने की मंजूरी दे दी है। 3 डॉक्टरों की टीम बनाकर अहमदाबाद भेजी जा रही है जो वहां के अस्पताल में चल रही इस पद्धति का जायजा लेकर सरकार को िरपोर्ट देगी। इस बारे में फैसला लिया जाएगा।

अवेयरनेस