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ध्यान शिविर में स्वावलंबन साधना का अभ्यास किया

7 वर्ष पहले
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जैनस्थानक अग्र नगर में आयोजित ध्यान शिविर के 8वें दिन डॉ. पदम मुनि महाराज ने साधकों को स्वावलंबन की साधना का अभ्यास करवाया। पदम मुनि महाराज ने कहा कि हमेंं कर्म करने में सावधान रहना चाहिए, फल भोगने में नहीं। अक्सर व्यक्ति असावधानी में कर्म करता है और उस कर्म का उदय होने पर परमात्मा से शिकायत करता है कि ऐसा तो कोई भी कर्म मैंने नहीं किया, फिर मुझे दुखों का सामना क्यों करना पड़ रहा है।

पदम मुनि महाराज ने कहा कि शरीर पर उभरने वाली सभी संवेदनाएं हमारे कर्मों का फल ही हैं। जब उनके प्रति हम अच्छी या बुरी प्रतिक्रिया करते हैं तो नये कर्मों का बंधन हो जाता है। कर्मों से मुक्त होने के लिए उनके बंधन को समाप्त करना होगा। हम मात्र कर्मों के परिणामों से बचना चाहते हैं, जबकि जब तक बंधन होगा हमे परिणाम भुगतने ही पड़ेंगे।

इस अवसर पर वंशज मुनि महाराज ने ध्यान शिविर में उपस्थित साधकों का हौसला बढ़ाया। सभा में तरसेम जैन, नरेश जैन, बलविन्द्र जैन, डीजे जैन, महेन्द्रपाल जैन, हरमेश जैन, सत्यपाल जैन, अश्विनी जैन, राजकुमार जैन, विनय जैन, संदीप जैन आदि मौजूद थे।

ध्यान शिविर के 8वें दिन डॉ. पदम मुनि महाराज ने साधकों को स्वावलंबन की साधना का अभ्यास करवाया।

लुधियाना|जैन स्थानकसिविल लाइंस में आयोजित प्रवचन सभा में श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए उपाध्याय प्रवर जितेंद्र मुनि महाराज ने कहा कि आत्मा में ज्ञान का प्रकाश हो इसलिए भगवान की वाणी का श्रवण करो। गुरुओं के द्वारा सीखा हुआ ज्ञान हमें हृ्दय में धारण करना है। यही ज्ञान हमें परभव में सहायक होगा। महाराज ने कहा कि स्वयं का पराक्रम पुरुषार्थ ही संसार से पार लगाने वाला होता है। जीवन में अरिहंत अरिहंत वाणी सहयोगी बनती है। उन्होंने कहा कि धर्म औषधि के समान है और गुरुजन डॉक्टर के समान। उन्होंने कहा कि आचार्य हरिभद्र ने ग्रंथों की रचना की। वे फरमाते है कि भगवान सर्वज्ञ है। जीवन में कर्मों को, विकारों को, खत्म करना है तो ज्ञान, वैराग, संयम को अपनाना होगा।