लुधियाना. मशहूर कवि शिव बटालवी भी बॉलीवुड के लिए गीत लिखने के मकसद से मुंबई गए थे, मगर एक गीत लिखकर मुड़ आए थे। नई उम्र के गीतकार के तौर पर इरशाद कामिल ने तो वाकई कमाल कर दिया। पचास से ज्यादा फिल्मों के लिए हिट गीत लिखकर खूब नाम कमा लिया। कामिल के गीतों के मुरीद तो मेरे बच्चे भी हैं। यह कहना है पदमश्री कवि डॉ.सुरजीत पातर का। जो पंजाबी भवन में कामिल के एक महीना नज्मों का, इस नज्म संग्रह का विमोचन करने पहुंचे थे।
जज्बाती हुए डॉ.पातर बेबाकी से बोले, और से हटकर कामिल इतना मशहूर होकर भी किसी भ्रम में नहीं फंसे। प्रोफेशनल गीतकार के तौर पर डायरेक्टर, एक्टर और फिल्म-प्रेमियों के मुताबिक उन्होंने एक चरित्र को जहन में रखकर गीत लिखे। इसके बावजूद उसमें गहराई और सादगी को भी जिंदा रखा। इस सबके बावजूद कामिल ने अपने अंदर बैठे साहित्य प्रेमी को भी पहचान, जो एक श्रोता और पाठक के रुप में अपनी खामोशियों को सामने लाने की हसरत रखता है।
जवाब में कामिल ने भी जज्बाती होकर जवाब दिया कि जब हम यूनिवर्सिटी के हॉस्टल में रहते थे, तब डॉ.पातर का इंकलाबी कलाम जोर-जोर से गाते हुए कुछ उनके जैसे जज्बा पैदा करने की जुर्रत करते थे। साहित्य प्रेमियों से रु-ब-रु कामिल ने भी बेबाकी से खुलासा किया कि पापा प्रोफेसर थे, उनके खुले एतराज के बावजूद हिंदी-उर्दू पोएट्री में पीएचडी के बाद बड़ी चुनौतियों का सामना करना पड़ा। मालेरकोटला जैसे ट्रेडिशनल शहर से मुंबई जाकर फिल्मों में बतौर गीतकार किस्मत आजमाने का फैसला किया।
अपने गाइड प्रो.सतपाल सहगल से कहा कि पीएचडी कराकर जल्द बंदिशों से आजाद करिए। साथ पढ़े तेजवंत किट्टू ने मुंबई में म्युजिक डायरेक्टर होने के नाते काफी मदद की। पहली फिल्म फ्लॉप होने पर सन 2003 से लेकर 2007 तक एक तरह की गुमनामी में रहा। फिर जब वी मैट आई तो कामयाबी के रास्ते खुलते गए। मगर इस बीच बिना रुके, मायूसी से जूझ कर अपने अंदर छिपे कवि और शायर को जिंदा रखा।
इसलिए फिल्मी दुनिया की व्यस्तता के बावजूद एक शायर के तौर पर अपनों के बीच लौटा हूं। कामिल के लिए यह समारोह रखने वाले प्रीत साहित्य सदन के प्रमुख मनोज प्रीत डॉ.राजिंदर टाकी समेत तमाम साहित्यकारों ने उनकी तारीफ करते हुए उम्मीद जताई कि नामवर शायर साहिर लुधियानवी की परंपरा को वह आगे बढ़ाएंगे।
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