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सत्ता के लिए काउंटडाउन

6 वर्ष पहले
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नगर काउंसिल चुनाव का बिगुल बज गया है। ऐसे में नगर काउंसिल के प्रधान चुनने की कवायद भी शुरू हो गई है। बरनाला शहर में पहले 25 वार्ड थे और जिन्हें बढ़ाकर अब 31 कर दिया है। बरनाला नगर काउंसिल में मुख्य फाइट अकाली-भाजपा गठबंधन की कांग्रेस के साथ है। इसके अलावा आप भी लगभग सारे वार्डों में स्टेटस सिंबल पर अपने उम्मीदवार मैदान में उतारेगी। आजाद प्रत्याशी भी अपना भाग्य आजमाने के लिए उक्त पार्टियों से दो-दो हाथ करेंगे। शहर के लोग चाहते हैं कि इस बार साल 2015 में उन्हें मिलने जा रहा नगर काउंसिल का नया प्रधान बिल्कुल उनके ही जैसा हो। जैसे वह लोगों के हरेक सुख-दुख में शामिल होते हैं, उसी तरह वह भी आम व्यक्ति की तरह हरेक के सुख-दुख में शामिल हो और साथ ही शहर के विकास कार्यों से भी वह भलीभांति परिचित हो। क्योंकि लोगों की आशाओं के मुताबिक पिछला तजुर्बा बहुत बढ़िया नहीं रहा है।

लोगों को आशा थी कि उनका शहर खुबसुरत शहरों के रूप में विकसित होगा, लेकिन जो तस्वीर सामने है वो नगर काउंसिल पर काबिज रही अलग-अलग पार्टियों के विकास के दावों को मुंह चिढ़ा रही है। कोई खास उपलब्धि नहीं निकलकर सामने आई। आज शहर का कुछ हिस्सा पानी के लिए तरस रहा है। जो पानी मिल रहा है वह भी दूषित है। अगर मुलभूत सुविधाओं की बात करें तो विकास के विपरीत है। काउंसिल चुनावों के समय दावा तो 100 फीसदी वाटर सप्लाई और सीवरेज का किया जाता है, लेकिन जमीनी तौर पर इन दावों की हकीकत कुछ अलग है। ट्रैफिक का बुरा हाल है।

शहर में प्रशासन के पास कोई पार्किंग भी नहीं है। रोजाना शहर की सड़कों पर लगते जाम से आम लोगों को भारी परेशानियों का सामना करना पड़ता है। बाजारों में खड़े वाहन और अस्थाई तौर पर हो रहा अतिक्रमण ट्रैफिक समस्या के दो मेन कारण हैं। इसके अलावा गंदगी से लोग काफी दुखी हैं। कोई सुनने वाला भी नहीं है। पिछली नगर काउंसिल कमेटी ने शहर का कोई खास विकास नहीं करवाया, इसलिए इस बार शहर बरनाला के लोगों को नगर काउंसिल की नई 2015 की कमेटी से काफी आस बंधी है। शहर में अगर मुख्य समस्याओं की बात की जाए तो उनमें सीवरेज की समस्या शहर की प्रमुख समस्याओं में से एक है। इस समस्या के समाधान के लिए काउंसिल की पिछली कमेटी ने कोई कारगर कदम नहीं उठाए। राजनेताओं ने भी इस समस्या के समाधान के लिए ढेर सारे वादे किए लेकिन सारे वादे हवा में उड़ गए। दूसरी मेन समस्या ट्रैफिक की है। बरनाला जिला बनने के बावजूद शहर में नगर काउंसिल के पास शहर का कूड़ा कर्कट फेंकने के लिए कोई डंप नहीं है।

शहर का सारा कूड़ा कर्कट खुले में फेंका जा रहा है। कभी भी शहर में महामारी फैल सकती है। शहर की सड़कें भी जगहों-जगहों से टूट चुकी हैं। पिछली कमेटी ने शहर का विकास करवाने की बजाय अपना ही विकास किया, इसलिए लोग चाहते हैं कि इस बार जो कमेटी का प्रधान चुनेंगे वह खुद लोग अपनी मनपसंद का ही चुनेंगे।

बरनाला नगर काउंसिल के पूर्व प्रधान परमजीत सिंह ढिल्लों पिछले चुनावों में अकाली दल की टिकट से वार्ड नंबर-18 से चुनाव लड़े और उन्होंने कांग्रेसी उम्मीदवार अजायब सिंब बुढेके को पराजित कर वह नगर काउंसिल के पांच साल तक प्रधान बने रहे।

आसाननहीं प्रधान पद का रास्ता

चुनावलड़ने वाला नेता चाहे वह किसी भी पार्टी से क्यों ना हो रात को सोते वक्त काउंसिल प्रधान बनने के सपने ले रहे हैं, लेकिन रास्ता आसान नहीं है। उसे बहुत सी चुनौतियों से भी रूबरू होना पड़ेगा। बरनाला नगर काउंसिल पर ज्यादातर कब्जा अकाली दल का रहा है और इस बार देशभर में चल रही मोदी लहर को देखते हुए भाजपा अपना प्रधान चुनने की दौड़ में है। लोग भी यहीं चाहते हैं कि अकालियों के राज में कई सालों तक शहर का जो विकास होना चाहिए था उसे करने में तो वह नाकाम रहे हैं। इसलिए इस बार प्रधान किसी अन्य पार्टी का ही होना चाहिए और उसे अपने आप को सिद्ध करना होगा और सोचना होगा कि उसे शहर का विकास कैसे कराना है।

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